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संदेश

31वाँ हिंदी मेला

विगत कई वर्षों से गीता दी ( गीता डूबे) और शिप्रा दी ( डॉ शिप्रा मिश्रा) मुझे हिंदी मेले के विषय में बताती रही थी,और दोनों विभूतियों का यही प्रश्न था कि "आप हिंदी मेला क्यों नहीं जाती हो' | क्योंकि नौकरी पेशा, शिक्षिका हूं तो घर की जिम्मेदारियां अपने कर्म क्षेत्र की जिम्मेदारी मुझे रोकती रही | सौभाग्यवश इस वर्ष मुझे इस मेले में शिरकत करने का समय और अवसर भी मिल गया | हिंदी मेला की सदस्यता प्राप्त करके हिंदी मेले में जाना प्रारंभ किया कई कार्यक्रमों की रूपरेखा मैंने देखा, और सभी को इन कार्यक्रमों की तैयारी बड़े ही लग्न के साथ करते हुए देखा , इस मेले में बड़े-बड़े साहित्यकारों का जमावड़ा देखा और क्योंकि 26 तारीख को यह कार्यक्रम प्रारंभ होने वाला था और 1 जनवरी तक यह कार्यक्रम चलता तो 26 को मेरी एक और कार्यक्रम थी रिसड़ा में जिसके कारण में प्रथम दिवस मेले में उपस्थित नहीं रह सकी, किंतु उसके बाद 27 दिसंबर 2025 से मैं लगातार प्रतिदिन मेले में शिरकत करती रही | उसके समापन दिवस तक भी मेले में मेरी उपस्थित रही, हालांकि ज्यादा देर तक रुक ना सकी |  कोलकाता के विद्यालयों में शिक्ष...

हाय मेंरी हिंदी!

 आज बड़े दिनों बाद कालीघाट जाने का अवसर मिला मां के दर्शन की बड़ी इच्छा थी, सोचा कि चलो नवरात्रि के शष्टि के दिन मां के दर्शन कर आएं | भक्ति भावना से परिपूर्ण होकर मां के दर्शन हेतु मंदिर के प्रांगण में पहुंच तो गई पर कुछ तो वहां की कुव्यवस्था, पंडाओं के मनमाना दक्षिणा वसूलने की स्थिति को देखकर मन बहुत उदास था | लग रहा था कि अब वर्तमान के समय में हर जगह व्यापारियों का बोलबाला हो रहा है चाहे वह कोई भी स्थान क्यों ना हो! वी आई पी दर्शन के नाम पर, वी आई पी लाइन के नाम पर जितने भी श्रद्धालु वहां पहुंचे थे उनसे मनमाना रकम वसूलना व्यापार नहीं तो क्या है ? और सबसे बड़ी विडंबना की बात तो यह है कि यह सब कुछ प्रशासन के सामने उनके समक्ष हो रहा था|  जब किसी श्रधालू ने उनसे पूछा कि सर क्या यह वी आई पी जैसी भी कोई व्यवस्था है क्या? तो उन्होंने कहा हमें इसके बारे में कुछ नहीं पाता जबकि ठीक उनके सामने बिल्कुल सामने यह सारी व्यवस्था चल रही थी |  खैर मन मसोस कर माँ के दर्शन हेतु वहाँ गई थी, बस उसी श्रद्धा को मन में रखते हुए किसी तरह अंदर पहुंची तो,जो चित्र मैंने यहां प्रस्तुत क...

निजता रही क्या?

आभासी पटल बड़ा मजेदार लगता है| फेसबुक, इंस्टाग्राम,युटुब आदि जाने ही कितने आभासी पटल है,जिसमें मैं अक्सर देखती हूं लोग अपने खाने के, घूमने के अक्सर फोटो डालते रहते हैं | क्या यह निजता का हनन नहीं है? ये प्रश्न बार-बार मेरे मन में कौंधता रहता है | एक अंग्रेजी में शब्द है privacy क्या य इस शब्द की महत्ता रही हमारे जीवन में | हम अक्सर इन मीडिया प्लेटफॉर्म पर देखते हैं कि लोग दिनचर्या के भी वीडियो और फोटोस डालते रहते हैं, क्या यह सही है? कि हम अपनी दैनिक क्रिया को भी इन मीडिया प्लेटफॉर्म पर मनोरंजन के रूप में डालें, क्या हम मनोरंजन के पात्र बनकर रह गए हैं? लाइक, कॉमेंट्स और फॉलोअर्स बढ़ाने के लिए हम भूल गए हैं की एक समय था जब लोग हमें जानने के लिए हमें पहचानने के लिए हमसे मिलने आते थे, वार्तालाप होते थे, परिचर्चाऐं होती थी| किंतु यह बहुत ही अफसोस की बात है कि अब हम लोगों के जीवन को मीडिया प्लेटफॉर्म पर मनोरंजन के रूप में देखने लगे हैं| कहां रही हमारी निजता और क्या हमारा निजी जीवन केवल और केवल मनोरंजन का साधन मात्र बनकर रह गया | यह विचार मेरे खुद के हैं और यह विचार बार-बार मेरे ...

माँ दुर्गा को प्रिय लाल चुनरी

लाल चुनरी  ******** सुनो आज तुम्हें मैं,   मित्रों माता की कथा सुनाती हूं,   लाल चुनर लाल सिंदूर का,   महत्व आज मैं बताती हूं | दुष्ट राक्षसो से,  धरती रही थी कांप,  देवता भी विवश हुए,  किया मिलकर संताप  | त्रिदेवो ने मिलकर,  मां का किया आवाहन,   माता फिर प्रकट हुई,  सिंह को बनाया वाहन | दुष्टों का संहार करने माँ,   अष्ट भुजाओं वाली निकली,  दानव दल का वध करने ,   खड्ग उठा माता चली| युद्ध अंत में माता का,  तन था रक्त रक्तरंजित ,  लाल रक्त देख माता,  ह्रदय से हुई मुदित | तभी से ही माता को,  लाल रंग है भाते,  मां को खुश करने भक्त,   लाल चुनर है चढ़ाते | स्वेता गुप्ता "स्वेतांबरी"(कोलकाता) स्वरचित /मौलिक

गूंगे बहरे अँधे

गूंगे बहरे अँधे हाँ! हम गूंगे बहरे और अँधे हो चुके है | हम अँधे है क्योंकि साक्षात् सामने देखकर भी हम अनदेखा करने लगे है | हम गूंगे है क्योंकि सच बोलने से परहेज करते है और बहरे इसलिए, क्योंकि चीखो को अनसुना करने लगे है |  कैसी स्थिति बन गई है हमारे देश की, एक तरफ तो हम चंद्रयान - 3 की सफलता का उत्सव मना रहे हैं और एक तरफ मणिपुर के नृशंश स्थिति से रूबरू  हो रहे है | मुझे तो समझ ही नहीं आ रहा कि हजारों की भीड़ में वीडियो बनाने वाले को वायरल करने की हिम्मत है, पर बचाने की हिम्मत नहीं | कुछ समय पहले एक वाकया दिल्ली में भी हुआ था, जिसका जिम्मेदार सोशल मीडिया और हमारे बच्चियों को दी गई आजादी को ठहराया गया | हमें स्वच्छंद नहीं बंदिशों में रहने की सीख दी गई| पर अब क्या? यह मणिपुर की घटना पर इतनी शांति कैसे है? सबसे बड़ी बेशर्मी तो उनकी दिखती है जो, पीड़िता से मिलने पूरी मिडिया और लाव लश्कर के साथ जाते हैं| दिखावा करते हैं कि हम तुम्हारे साथ हैं! अगर आप लाव लश्कर  ले जाने की हिम्मत रखते हैं,पूरी मीडिया ले जाने की हिम्मत रखते हैं तो,न्याय की व्यवस्था में इतनी देरी क्यों...

सच जरुरी क्यों है?

  सच का अर्थ है, जो यथार्थ हो! सच से रूबरू होना जरूरी भी है | सच को जानने व समझने का इस धरती पर सभी को समान रूप से अधिकार भी दिया गया है | हमें सच जानने का हक है |  हो भी क्यों ना, सच्चाई मनुष्य के हर उस पक्ष को हमारे सामने प्रस्तुत करती है, जिससे हम  अनभिज्ञ रहते हैं |  परंतु उस सच का क्या जिसे जानने के बाद रोष पैदा हो, रोष भी ऐसा वैसा नहीं, ज्वलनशील पदार्थ की तरह हवाओं में इस प्रकार से घुल जाए जो आग पैदा करें आग | हमें किस प्रकार का सच बताया जा रहा है, या जताया जा रहा है यह उस बात पर निर्भर करता है कि, आखिर वह सच क्या है?कैसा है?  वर्तमान परिपेक्ष्य में देखा जाए तो हम सच दिखाने और बताने के लिए इतने आतुर हो चुके हैं कि,सच की परिभाषा को तोड़ मरोड़ कर अपने फायदे के लिए नमक मिर्च के मसाले के साथ परोस रहे हैं| किसलिए परोस रहे हैं हमें नहीं पता| बस ज्वलंत मुद्दा है, उठाना है,उसे समाज के सामने पहुंचना है, चिंगारी को आग में बदलना है,और खड़े होकर तमाशा देखना है| तमाशा का लुत्फ़ उठाना है| समाज का वह तबका जिसे हम बुद्धिजीवी कहते हैं उनकी चुप्पी बड़ा विचलित करती है|  ...

हिन्दी अभेद दीवार

 "हिंदी देश के सबसे बड़े भूभाग में बोली जाने वाली भाषा है और राष्ट्रभाषा कहलाने की अधिकारिणी है"  यह कथन नोबेल पुरस्कार विजेता आदरणीय श्री रविंद्र नाथ टैगोर जी का है| बंगाल की भूमी में जन्मे और अपने कला क्षेत्र के लिए पूरे विश्व में प्रसिद्धि पाने वाले बंगाल के साहित्य शिरोमणि, हिंदी को प्रमुखता देते थे| कितने आश्चर्य की बात है कि उन्हीं की जन्मभूमि में हिन्दी के साथ भेदभाव हो रहा है|  जब यह समाचार सामने में आया कि बंगाल सिविल सर्विस परीक्षा में हिंदी को हटाया जा चुका है, तो दोबारा आँख मलते हुए समाचार को पढ़ा मैंने | अविश्वसनीय सा लगता है |ऐसा कैसे हो सकता है? जिस धरती पर हिंदी की अनेक संस्थाएँ जो अब तक हिंदी की सेवा में संलग्न है और उतनी ही तत्परता से हिंदी की सेवा करती आ रही है | उसी बंगाल की धरती पर हिन्दी के प्रति ऐसा भेदभाव |  विविधता में एकता का देश है हमारा, यहां क्षेत्रीय भाषा को उतना ही सम्मान मिलता है जितना कि राष्ट्रीय भाषा को मिलता है | गैर बंगालियों और हिंदी भाषियों ने बंगाल की उन्नति और विकास में उतना ही सहयोग दिया है जितना बंगाल वासी देते है...

सिकंदर हूँ मैं

 उम्र के इस मोड़ पर बिना पत्तों का दरख़्त हूँ तुम पतझड़ी मौसम सी सूखा समंदर हूं मैं  संगिनी तुम अर्धांगिनी मीठास बेस्वाद सा हूँ  तुम लहरों की सानी  जज्बातों का समंदर हूं मैं  तुम खिलती धूप सी  मैं बरगद की छांव  समय के अलबेले थपेड़ों में  अपनेपन का बवंडर हूं मैं  कौन कहता है उम्र बीत गई हाथों में तेरा हाथ हो तो तनती हर एक सांस तक  मुकद्दर का सिकंदर हूं मैं! मुकद्दर का सिकंदर हूं मैं!! @स्वेता गुप्ता "स्वेताम्बरी"

लहर

 *लहर*  अब लहर का नाम सुनते ही ना जाने क्यों भयावह एक कुंठा ह्रदय में बैठ जाती है | एक अंजाना सा सुप्त भय अचानक से जागने लगता है | 22 फरवरी 1920 देश में राष्ट्र के नाम संदेश सुना ; एक अप्रत्याशित अंजाना सा *लॉकडाउन* लगा दिया गया | जिससे हम अनभिज्ञ थे | शिक्षित थोड़ा समझ भी रहे थे, परन्तु जो रोजी-रोटी ही शिक्षा मान रहे थे उनके लिए तो विपदाओं का बहुत ही ऊंचा पहाड़ उन पर गिर पड़ा था |  चारों और भय का वातावरण, उस वातावरण में घुट घुट कर जीती जिंदगी! ऐसी जिंदगी जो समय सीमा में बंध गई थी| *मास्क* नाम का आवरण चेहरे पर चढ़ा दिया गया था | लगता था जैसे हम उधार का जीवन जी रहे हैं | लोग मर रहे थे, और अफवाहों का बाजार यूँ सज रहा था *सुबह उन्हें स्वस्थ देखा पर शाम को वह गुजर गए*  *ये करोना वरोंना कोई बीमारी नहीं सोची समझी साजिश है* *फंला वर्ग के लोगों ने हमारे वर्ग को मिटाने के लिए षड्यंत्र रचा है*|  पूरा विश्व इस त्रासदी से जूझ रहा था | एशिया के किन्हीं देशों में हजारों में लोग प्रतिदिन मर रहे थे | कोई दवा काम नहीं कर रही थी | केवल अनुमान व अनुभव से इलाज किया जा रहा था|  ल...

प्रेम----- गीत

रोज करते याद अब हम आपको, पीर कैसे हम  बताएं आपको....! दिल में मेरे बसाया था जहां, धड़कने उठती वहाँ बनके शमा! जो रहे अरमा जताना आपको, टूटकर चाहा बताना आपको! रोज करते याद अब हम आपको, पीर कैसे हम बताएं आपको....! प्रेम तुमसे है जताया ना कभी, दिल्लगी तुमको बताया ना सभी! प्रेम सच में जीत था ना हार भी, अब कहीं जाना सनम हम आपको! रोज करते याद अब हम आपको, पीर कैसे हम बताएं आपको.....! स्वेता गुप्ता "स्वेतांबरी"(कोलकाता) स्वरचित /मौलिक

वरदान

जीवन में वरदान मांगते, जीव अनेको देखें है | थोड़े में संतोष से जीते, सौ में एक ही देखे हैं || मिथ्या आडंबर दिखावा, सारा जीवन वार दिया | भंडार संपदा से ललचाकर, अपनों पर ही वार किया|| विकट समय मार्ग बदल जो, पीठ सदा दिखाते हैं | ऐसे रिश्ते निजता का, हमे  पाठ पढ़ा जाते है || स्वेता गुप्ता "स्वेताबरी"(कोलकाता) स्वरचित /मौलिक

चोट दिल पर

                      चोट दिल पर हमी रोज खाते रहे,                         सादगी से मगर मुस्कराते रहे|                         ज़ख्म गहरे मगर तो जताया नहीं,                         अश्क आंखो के हम वो छुपाते रहें|                           गम नहीं हो गये आप बेदर्द जो,                            चोट देकर जहर भी लगाते रहे|                           ख़्वाब जज्बात के नित बिखरते गये,                             अश्क मोती वहीं के सजाते रहे|                 ...

अपनों से बढ़ती दूरियां

विभा बहुत परेशान है,बगल में चाची जी के फ़्लैट से बहुत जोर की बदबू आ रही है | वह बिल्डिंग के सेक्रेटरी के पास जाकर शिकायत करती है कि घर के बगल में रहनेवाली उसकी चिड़चीड़ी चाची के फ़्लैट से बहुत जोर की बदबू आ रही है | सेक्रेटरी के पास और भी लोग इस बात की शिकायत लेकर पहुंचे हुए थे |सेक्रेटरी  आनन -फानन में इस बात का पता लगाने के लिए चाची जी के घर का  दरवाजा जोर-जोर से खटखटाते हैं| बैल भी बजाते हैं,पर दरवाजा नहीं खुलता | दरवाजा भीतर से बंद है, दरवाजे के बाहर रोज का अखबार दूध की तीन चार बोतलें ऐसे ही पड़े हुए हैं | सेक्रेटरी को ना जाने क्या सूझता है,वह तुरंत पुलिस को कॉल करते हैं| पुलिस आती और दरवाजा तोड़ दिया जाता है | अंदर का नजारा देखकर सभी स्तब्ध रह जाते हैं  | चाची जी कुर्सी पर लुढ़की हुई मृत पाई जाती है | विभा को काटो तो खून नहीं मन में जाने कौन सा रंज बैठा कर उसने चाची जी से बात करना छोड़ दिया था | चाची जी अकेली,कोई संतान नहीं | अकेली ही वहां रहती थी | यही कारण था कि उनसे कोई बात करने वाला नहीं था | चिड़चिड़ी हो गई थी बुढ़ापे के कारण,चाचाजी भी वर्षों पहले परलोक सिधार गए थे...

तुलसी विवाह महिमा

आओ एक कथा सुनाए  विवाह तुलसी की कराए  मंडप सुन्दर सा सजाए  महिमा एकादशी गाए शिव तेज सागर फेंका  बालक जन्मा ना नेका जालंधर नाम पड़ा था  वो कारण भू कांपा था  वृंदा से परिणय बंधकर  मद मस्त था वो जालंधर लक्ष्मी पाने का हठकर युद्ध करें वो भयंकर  सागर पुत्री थी माता लो मान लिया भ्राता लालच बढ़े था हठी का पाने मां पार्वती  का महादेव  रूप धरा था छलिया दुष्ट बड़ा था मां योगबल से पहचाना शीघ्र हो अंतरध्याना सारी घटना सुनाया केशव को बात बताया थी अनन्य रागी वृंदा  ना सुने जलंधर निंदा पति धर्म जो भंग करेगा वो जलंधर तभी मरेगा माधव ऋषि रूप धारे  वृंदा को जा पुकारे  सतीत्व भंग कर डाला था वो दिवस जो काला लीला वृंदा जब जाने मोहन हृदय हीन माने भर गईं कोप से सीता श्राप लगा दिया तीता सकल देव अब पुकारे सब काल तेरे सहारे  ले वापस श्राप पवित्रा हो गई भस्म वो चित्रा एक लौ फूटा वहां पर दल तुलसी था जहां पर विष्णु प्रिया बनी वो लक्ष्मी सा रूप धरे वो विवाह  तुलसी  करे है केशव सब पाप हरे है स्वेता गुप्ता "स्वेतांबरी"(कोलकाता) स्वरचित /मौल...

एक नया दीपोत्सव मनाते है...!

चलो एक नया दीपोत्सव मानते है,  अंतस में बैठा अंधकार मिटाते हैं| दीपों भरी दिवाली हर वर्ष हमने मनाया , सच को झूठ के पर्दों में खूब छिपाया  | राम ने वचनों की खातिर चौदह वर्ष वारा था, सीताहरण घृण्य कार्य पर रावण को मारा था| अब तो वचनों की बातें पल में झुठलाते  हैं, दिन के उजाले में भी सीता हर ले जाते हैं | सुग्रीव सुदामा जैसे मित्र कहां अब हम  पाएंगे , बीच बाजार वो दोहरा चरित्र दिखलाएँगे | चकाचौंधी आकर्षण में अपनी जड़ें भुला गए, हम थे हम ही रहेंगे नजरिया दिखला गए | मान अनुजा के हेतू सीता हरा था रावण ने, था दंभी फिर भी बंधा था मर्यादा के दामन ने | कलयुग है या भटयुग कौन सा युग है ये, मिलते नहीं रावण जैसे भी जाने कैसा जुग है ये | दीपों के उजाले लें अंधकार हम मिटाते हैं, दिवाली में जाने कितने भूखे पेट सो जाते हैं| कुछ तो सोचो बारे उनके जो त्यौहार नहीं मना पाए, अपनी धरा से जुड़ कर भी संस्कार नहीं अपना पाए| क्या भगवत गीता की बातें कागज में सिमटी जाएगी, मझधार में भटकती नैया भी क्या  पार लगाएगी | अंकुश नहीं वाणी में सम्मान कहां से पाओगे, गड्ढा खोदा जिसका तुमने स्वयं ही गिर...

नई शिक्षा नीति एक विचार

शिक्षा प्राप्ति अर्थात केवल किताबी पठन-पाठन ही नहीं, बौद्धिक, मानसिक और नैतिक शिक्षा विकास से है | भारत सरकार द्वारा 2020 में प्रस्तावित नई शिक्षा नीति लगभग 34 वर्षों के पश्चात शिक्षा परिदृश्य में एक महत्वपूर्ण कदम है| अभी इसे बदलाव नहीं कहेंगे तो और क्या कहेंगे, कि मानव संसाधन मंत्रालय का नाम शिक्षा मंत्रालय कर दिया गया, जो कि एक समुचित कदम है तो है ही तथा शिक्षा के लिए अलग मंत्रालय की सोच सरकार का शिक्षा के प्रति समर्पण भाव दर्शाता है | जीडीपी का 6% शिक्षा में लगाने का लक्ष्य शिक्षा के आधारभूत ढांचे के निर्माण में बेहतर दिशा प्रदान करेगी, जो भारत की शिक्षा पद्धति को और समृद्ध और सुदृढ़ करेगी | इसी परिप्रेक्ष्य में 2030 तक 3 से 18 वर्ष के आयु वर्ग के प्रत्येक बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करने का लक्ष्य बनाया गया है| जो कि शिक्षा के प्रति उठाया गया एक ठोस कदम है | पुराने ढांचे 10+2 को बदलकर 5+3+3+4 पद्धति को लागू करने का विचार सराहनीय है | जिसमें 3 वर्ष तक के बच्चों को महत्वपूर्ण नैतिक शिक्षा दिया जा सकेगा, जिससे उनका मानसिक और बौद्धिक विकास होगा | अंग्रेजी माध्यम में पढ़ाने क...

अनाथ

कभी कभी जीवन में कुछ ऐसा अप्रत्यशित घटना घटित हो जाती है जिसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते |  ऐसे ही विद्यालय कार्य से मुक्ति पा बाजार जाना एक आदत सी बन गई थी | खरीदारी के शेष में एक बूढी माता जी से कभी -कभी  केले खरीदती थी| |वो माताजी पुरे बाजार में सबसे सस्ते केले बेचती थी | परन्तु कुछ दिनों से उन्हें  देख नहीं पा रही थी | उनके साथ वाली महिला मित्र से उन्हें ना देख पाने का कारण पूछा तो, जो जानकारी प्राप्त हुई उससे मन वेदना से भर उठा |  उन माताजी के चार बेटे हैं,  चारों ने विवाहोपरांत बूढ़ी माता जी को छोड़ दिया | कोई बहू  उन्हें साथ में नहीं रखना चाहती | इसलिए वह अपना भरण-पोषण अपने घर के पीछे लगे केले के पेड़ों से जो केले होते थे उन्हें बाजार में बेचकर अपनी जीविका चलाती थी |परंतु एक हफ्ते पहले हृदयाघात से उनकी मृत्यु हो गई कोई भी बेटा उनके अंतिम संस्कार में उपस्थित ना हो पाया,  या यूं कहें कोई नहीं आया |गांव के लोगों ने ही मिलकर उनका अंतिम संस्कार किया| यहां हम अनाथ विषय के ऊपर बात कर रहे हैं, अनाथ विषय पर अपनी लेखनी को प्रखर कर रहे हैं| परंतु उन लोगों ...

आज का कवि साहित्यकार इतना अधीर क्यूँ????

 एक साहित्यकार समाज में हो रहे राजनैतिक, सामाजिक परिस्थितियों को, अपने मनोभावों को रचनाओं के माध्यम से  सजा कर प्रस्तुत करता है | समाज में घटित घटनाओ पर चिंतन मनन कर अपने  विचारों को अपनी लेखनी द्वारा प्रस्तुत करता है|  पर आज के वर्तमान समय में कितने साहित्यकार और कवि है जिनमे एक होड़ सी लगी है |आगे बढ़नेके क्रम में उन्हें कविता की गुणवत्ता से कम मान पत्रों पर ज्यादा विशेष ध्यान रहने लगा है| या यूं कहें कि साहित्य क्षेत्र का पायदान धरातल की तरफ जाता जा रहा है | अभी करोना के समय में जिस प्रकार से साहित्य को एक मीडिया प्लेटफॉर्म मिला है, यह एक सकारात्मक पक्ष कह सकते हैं| जिसमें बहुत से लोग जो इन क्षेत्रों से जुड़े हो कर भी कलमकारी से दूर थे |अब इस मीडिया प्लेटफॉर्म के द्वारा उन्हें साहित्य से जुड़ने का अवसर मिला है |अपनी लेखनी अपनी रचनाओं को पटल पर विश्व के समक्ष प्रस्तुत करने का अवसर  मिला है | परंतु नकारात्मक पक्ष भी है कि मीडिया प्लेटफॉर्म में किस प्रकार से एक ही विषय पर एक ही रचनाकार दो तीन रचनाएं लिखते हैं, और उसी विषय पर और भी कई रचनाकार अपनी रचनाएं प्रस्तुत ...

नवरात्रि "" माँ के नौ रूप""

" प्रथमा शैलपुत्री "  मां पर्वतराज पुत्री,  एक हाथ त्रिशूल विराजे,  दूजे में कमल पुष्प,  नवदुर्गा में प्रथमा दुर्गा,  योग साधना का दिखाएं रूप ! " द्वितीय ब्रह्मचारिणी "  अत्यंत भव्य ज्योतिर्मय रूप,  मां तप आचरण करने वाली,  जप की माला कमंडल ले,  त्याग वैराग्य का देती स्वरूप ! " तृतीय चंद्रघंटा "  मस्तक अर्धचंद्र विराजे,   सिंह वाहिनी स्वर्ण मुखी मां,   कष्टों को हर लेती मैया,   उपासना की देती अनुकंपा ! " चतुर्थी कुष्मांडा"  मृदुल मुस्कान ब्रह्मा उत्पन्नी,   भवसागर का दिखाती मार्ग,   सुगम श्रेयस्कर अलौकिक,   सुख को देने वाली समृद्धि,   उन्नति की देती अनुकंपा ! " पंचमा स्कंदमाता "  कमल आसन विराजने वाली,  पद्मासन देवी कहलाती,  कार्तिकेय की माता,  साधक को देती आशीष ! " षष्टी कात्यायनी " अमोघ फलदायनी,  कठिन तप ऋषि घर जन्मी,  अलौकिक तेज की स्वामिनी,  सहजता का देती अनुकंपा ! " सप्तम कालरात्रि " रूप कराली शुभड्करी,  सिद्दी की देवी,...

हिन्दी

निज भाषा विश्वास जगाती हिंदी,  सहज, शब्द, अतुल्य भंडार ये हिंदी ! हजारों वर्ष पुरानी अपभृंश ये हिंदी,  नीति, श्रृंगार, शौर्य की हिंदी ! आर्यों की परिभाषित हिंदी,  अवहट्ट, चंद्रधर गुलेरी की हिंदी ! आदिकाल,भक्तिकाल,आधुनिक काल की हिंदी,  खड़ी बोली इतिहास की हिंदी! तुलसी, जायसी कवियों की हिंदी,   मीरा की भक्ति में हिंदी!  सूर के पद हो या दोहे कबीर के,  समाज को दिशा दिखाती हिंदी! लघुकथा, उपन्यास,  मुक्तक सी  हिंदी,  भारतेंदु, निराला, प्रेमचंद की हिंदी!  गौरव गाथा सरल बना,  जन जन तक पहुंचाती हिंदी!  शौरसेनी, अर्धमागधी से प्रकटी हिंदी,   राष्ट्रभाषा हमारी हिंदी....! स्वेता गुप्ता "स्वेतांबरी"