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31वाँ हिंदी मेला

विगत कई वर्षों से गीता दी ( गीता डूबे) और शिप्रा दी ( डॉ शिप्रा मिश्रा) मुझे हिंदी मेले के विषय में बताती रही थी,और दोनों विभूतियों का यही प्रश्न था कि "आप हिंदी मेला क्यों नहीं जाती हो' | क्योंकि नौकरी पेशा, शिक्षिका हूं तो घर की जिम्मेदारियां अपने कर्म क्षेत्र की जिम्मेदारी मुझे रोकती रही | सौभाग्यवश इस वर्ष मुझे इस मेले में शिरकत करने का समय और अवसर भी मिल गया | हिंदी मेला की सदस्यता प्राप्त करके हिंदी मेले में जाना प्रारंभ किया कई कार्यक्रमों की रूपरेखा मैंने देखा, और सभी को इन कार्यक्रमों की तैयारी बड़े ही लग्न के साथ करते हुए देखा , इस मेले में बड़े-बड़े साहित्यकारों का जमावड़ा देखा और क्योंकि 26 तारीख को यह कार्यक्रम प्रारंभ होने वाला था और 1 जनवरी तक यह कार्यक्रम चलता तो 26 को मेरी एक और कार्यक्रम थी रिसड़ा में जिसके कारण में प्रथम दिवस मेले में उपस्थित नहीं रह सकी, किंतु उसके बाद 27 दिसंबर 2025 से मैं लगातार प्रतिदिन मेले में शिरकत करती रही | उसके समापन दिवस तक भी मेले में मेरी उपस्थित रही, हालांकि ज्यादा देर तक रुक ना सकी |  कोलकाता के विद्यालयों में शिक्ष...
हाल की पोस्ट

हाय मेंरी हिंदी!

 आज बड़े दिनों बाद कालीघाट जाने का अवसर मिला मां के दर्शन की बड़ी इच्छा थी, सोचा कि चलो नवरात्रि के शष्टि के दिन मां के दर्शन कर आएं | भक्ति भावना से परिपूर्ण होकर मां के दर्शन हेतु मंदिर के प्रांगण में पहुंच तो गई पर कुछ तो वहां की कुव्यवस्था, पंडाओं के मनमाना दक्षिणा वसूलने की स्थिति को देखकर मन बहुत उदास था | लग रहा था कि अब वर्तमान के समय में हर जगह व्यापारियों का बोलबाला हो रहा है चाहे वह कोई भी स्थान क्यों ना हो! वी आई पी दर्शन के नाम पर, वी आई पी लाइन के नाम पर जितने भी श्रद्धालु वहां पहुंचे थे उनसे मनमाना रकम वसूलना व्यापार नहीं तो क्या है ? और सबसे बड़ी विडंबना की बात तो यह है कि यह सब कुछ प्रशासन के सामने उनके समक्ष हो रहा था|  जब किसी श्रधालू ने उनसे पूछा कि सर क्या यह वी आई पी जैसी भी कोई व्यवस्था है क्या? तो उन्होंने कहा हमें इसके बारे में कुछ नहीं पाता जबकि ठीक उनके सामने बिल्कुल सामने यह सारी व्यवस्था चल रही थी |  खैर मन मसोस कर माँ के दर्शन हेतु वहाँ गई थी, बस उसी श्रद्धा को मन में रखते हुए किसी तरह अंदर पहुंची तो,जो चित्र मैंने यहां प्रस्तुत क...

निजता रही क्या?

आभासी पटल बड़ा मजेदार लगता है| फेसबुक, इंस्टाग्राम,युटुब आदि जाने ही कितने आभासी पटल है,जिसमें मैं अक्सर देखती हूं लोग अपने खाने के, घूमने के अक्सर फोटो डालते रहते हैं | क्या यह निजता का हनन नहीं है? ये प्रश्न बार-बार मेरे मन में कौंधता रहता है | एक अंग्रेजी में शब्द है privacy क्या य इस शब्द की महत्ता रही हमारे जीवन में | हम अक्सर इन मीडिया प्लेटफॉर्म पर देखते हैं कि लोग दिनचर्या के भी वीडियो और फोटोस डालते रहते हैं, क्या यह सही है? कि हम अपनी दैनिक क्रिया को भी इन मीडिया प्लेटफॉर्म पर मनोरंजन के रूप में डालें, क्या हम मनोरंजन के पात्र बनकर रह गए हैं? लाइक, कॉमेंट्स और फॉलोअर्स बढ़ाने के लिए हम भूल गए हैं की एक समय था जब लोग हमें जानने के लिए हमें पहचानने के लिए हमसे मिलने आते थे, वार्तालाप होते थे, परिचर्चाऐं होती थी| किंतु यह बहुत ही अफसोस की बात है कि अब हम लोगों के जीवन को मीडिया प्लेटफॉर्म पर मनोरंजन के रूप में देखने लगे हैं| कहां रही हमारी निजता और क्या हमारा निजी जीवन केवल और केवल मनोरंजन का साधन मात्र बनकर रह गया | यह विचार मेरे खुद के हैं और यह विचार बार-बार मेरे ...

माँ दुर्गा को प्रिय लाल चुनरी

लाल चुनरी  ******** सुनो आज तुम्हें मैं,   मित्रों माता की कथा सुनाती हूं,   लाल चुनर लाल सिंदूर का,   महत्व आज मैं बताती हूं | दुष्ट राक्षसो से,  धरती रही थी कांप,  देवता भी विवश हुए,  किया मिलकर संताप  | त्रिदेवो ने मिलकर,  मां का किया आवाहन,   माता फिर प्रकट हुई,  सिंह को बनाया वाहन | दुष्टों का संहार करने माँ,   अष्ट भुजाओं वाली निकली,  दानव दल का वध करने ,   खड्ग उठा माता चली| युद्ध अंत में माता का,  तन था रक्त रक्तरंजित ,  लाल रक्त देख माता,  ह्रदय से हुई मुदित | तभी से ही माता को,  लाल रंग है भाते,  मां को खुश करने भक्त,   लाल चुनर है चढ़ाते | स्वेता गुप्ता "स्वेतांबरी"(कोलकाता) स्वरचित /मौलिक

गूंगे बहरे अँधे

गूंगे बहरे अँधे हाँ! हम गूंगे बहरे और अँधे हो चुके है | हम अँधे है क्योंकि साक्षात् सामने देखकर भी हम अनदेखा करने लगे है | हम गूंगे है क्योंकि सच बोलने से परहेज करते है और बहरे इसलिए, क्योंकि चीखो को अनसुना करने लगे है |  कैसी स्थिति बन गई है हमारे देश की, एक तरफ तो हम चंद्रयान - 3 की सफलता का उत्सव मना रहे हैं और एक तरफ मणिपुर के नृशंश स्थिति से रूबरू  हो रहे है | मुझे तो समझ ही नहीं आ रहा कि हजारों की भीड़ में वीडियो बनाने वाले को वायरल करने की हिम्मत है, पर बचाने की हिम्मत नहीं | कुछ समय पहले एक वाकया दिल्ली में भी हुआ था, जिसका जिम्मेदार सोशल मीडिया और हमारे बच्चियों को दी गई आजादी को ठहराया गया | हमें स्वच्छंद नहीं बंदिशों में रहने की सीख दी गई| पर अब क्या? यह मणिपुर की घटना पर इतनी शांति कैसे है? सबसे बड़ी बेशर्मी तो उनकी दिखती है जो, पीड़िता से मिलने पूरी मिडिया और लाव लश्कर के साथ जाते हैं| दिखावा करते हैं कि हम तुम्हारे साथ हैं! अगर आप लाव लश्कर  ले जाने की हिम्मत रखते हैं,पूरी मीडिया ले जाने की हिम्मत रखते हैं तो,न्याय की व्यवस्था में इतनी देरी क्यों...

सच जरुरी क्यों है?

  सच का अर्थ है, जो यथार्थ हो! सच से रूबरू होना जरूरी भी है | सच को जानने व समझने का इस धरती पर सभी को समान रूप से अधिकार भी दिया गया है | हमें सच जानने का हक है |  हो भी क्यों ना, सच्चाई मनुष्य के हर उस पक्ष को हमारे सामने प्रस्तुत करती है, जिससे हम  अनभिज्ञ रहते हैं |  परंतु उस सच का क्या जिसे जानने के बाद रोष पैदा हो, रोष भी ऐसा वैसा नहीं, ज्वलनशील पदार्थ की तरह हवाओं में इस प्रकार से घुल जाए जो आग पैदा करें आग | हमें किस प्रकार का सच बताया जा रहा है, या जताया जा रहा है यह उस बात पर निर्भर करता है कि, आखिर वह सच क्या है?कैसा है?  वर्तमान परिपेक्ष्य में देखा जाए तो हम सच दिखाने और बताने के लिए इतने आतुर हो चुके हैं कि,सच की परिभाषा को तोड़ मरोड़ कर अपने फायदे के लिए नमक मिर्च के मसाले के साथ परोस रहे हैं| किसलिए परोस रहे हैं हमें नहीं पता| बस ज्वलंत मुद्दा है, उठाना है,उसे समाज के सामने पहुंचना है, चिंगारी को आग में बदलना है,और खड़े होकर तमाशा देखना है| तमाशा का लुत्फ़ उठाना है| समाज का वह तबका जिसे हम बुद्धिजीवी कहते हैं उनकी चुप्पी बड़ा विचलित करती है|  ...

हिन्दी अभेद दीवार

 "हिंदी देश के सबसे बड़े भूभाग में बोली जाने वाली भाषा है और राष्ट्रभाषा कहलाने की अधिकारिणी है"  यह कथन नोबेल पुरस्कार विजेता आदरणीय श्री रविंद्र नाथ टैगोर जी का है| बंगाल की भूमी में जन्मे और अपने कला क्षेत्र के लिए पूरे विश्व में प्रसिद्धि पाने वाले बंगाल के साहित्य शिरोमणि, हिंदी को प्रमुखता देते थे| कितने आश्चर्य की बात है कि उन्हीं की जन्मभूमि में हिन्दी के साथ भेदभाव हो रहा है|  जब यह समाचार सामने में आया कि बंगाल सिविल सर्विस परीक्षा में हिंदी को हटाया जा चुका है, तो दोबारा आँख मलते हुए समाचार को पढ़ा मैंने | अविश्वसनीय सा लगता है |ऐसा कैसे हो सकता है? जिस धरती पर हिंदी की अनेक संस्थाएँ जो अब तक हिंदी की सेवा में संलग्न है और उतनी ही तत्परता से हिंदी की सेवा करती आ रही है | उसी बंगाल की धरती पर हिन्दी के प्रति ऐसा भेदभाव |  विविधता में एकता का देश है हमारा, यहां क्षेत्रीय भाषा को उतना ही सम्मान मिलता है जितना कि राष्ट्रीय भाषा को मिलता है | गैर बंगालियों और हिंदी भाषियों ने बंगाल की उन्नति और विकास में उतना ही सहयोग दिया है जितना बंगाल वासी देते है...