लाल चुनरी
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सुनो आज तुम्हें मैं,
मित्रों माता की कथा सुनाती हूं,
लाल चुनर लाल सिंदूर का,
महत्व आज मैं बताती हूं |
दुष्ट राक्षसो से,
धरती रही थी कांप,
देवता भी विवश हुए,
किया मिलकर संताप |
त्रिदेवो ने मिलकर,
मां का किया आवाहन,
माता फिर प्रकट हुई,
सिंह को बनाया वाहन |
दुष्टों का संहार करने माँ,
अष्ट भुजाओं वाली निकली,
दानव दल का वध करने ,
खड्ग उठा माता चली|
युद्ध अंत में माता का,
तन था रक्त रक्तरंजित ,
लाल रक्त देख माता,
ह्रदय से हुई मुदित |
तभी से ही माता को,
लाल रंग है भाते,
मां को खुश करने भक्त,
लाल चुनर है चढ़ाते |
स्वेता गुप्ता "स्वेतांबरी"(कोलकाता)
स्वरचित /मौलिक
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