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हाय मेंरी हिंदी!

 आज बड़े दिनों बाद कालीघाट जाने का अवसर मिला मां के दर्शन की बड़ी इच्छा थी, सोचा कि चलो नवरात्रि के शष्टि के दिन मां के दर्शन कर आएं | भक्ति भावना से परिपूर्ण होकर मां के दर्शन हेतु मंदिर के प्रांगण में पहुंच तो गई पर कुछ तो वहां की कुव्यवस्था, पंडाओं के मनमाना दक्षिणा वसूलने की स्थिति को देखकर मन बहुत उदास था | लग रहा था कि अब वर्तमान के समय में हर जगह व्यापारियों का बोलबाला हो रहा है चाहे वह कोई भी स्थान क्यों ना हो! वी आई पी दर्शन के नाम पर, वी आई पी लाइन के नाम पर जितने भी श्रद्धालु वहां पहुंचे थे उनसे मनमाना रकम वसूलना व्यापार नहीं तो क्या है ? और सबसे बड़ी विडंबना की बात तो यह है कि यह सब कुछ प्रशासन के सामने उनके समक्ष हो रहा था|  जब किसी श्रधालू ने उनसे पूछा कि सर क्या यह वी आई पी जैसी भी कोई व्यवस्था है क्या? तो उन्होंने कहा हमें इसके बारे में कुछ नहीं पाता जबकि ठीक उनके सामने बिल्कुल सामने यह सारी व्यवस्था चल रही थी |  खैर मन मसोस कर माँ के दर्शन हेतु वहाँ गई थी, बस उसी श्रद्धा को मन में रखते हुए किसी तरह अंदर पहुंची तो,जो चित्र मैंने यहां प्रस्तुत क...

निजता रही क्या?

आभासी पटल बड़ा मजेदार लगता है| फेसबुक, इंस्टाग्राम,युटुब आदि जाने ही कितने आभासी पटल है,जिसमें मैं अक्सर देखती हूं लोग अपने खाने के, घूमने के अक्सर फोटो डालते रहते हैं | क्या यह निजता का हनन नहीं है? ये प्रश्न बार-बार मेरे मन में कौंधता रहता है | एक अंग्रेजी में शब्द है privacy क्या य इस शब्द की महत्ता रही हमारे जीवन में | हम अक्सर इन मीडिया प्लेटफॉर्म पर देखते हैं कि लोग दिनचर्या के भी वीडियो और फोटोस डालते रहते हैं, क्या यह सही है? कि हम अपनी दैनिक क्रिया को भी इन मीडिया प्लेटफॉर्म पर मनोरंजन के रूप में डालें, क्या हम मनोरंजन के पात्र बनकर रह गए हैं? लाइक, कॉमेंट्स और फॉलोअर्स बढ़ाने के लिए हम भूल गए हैं की एक समय था जब लोग हमें जानने के लिए हमें पहचानने के लिए हमसे मिलने आते थे, वार्तालाप होते थे, परिचर्चाऐं होती थी| किंतु यह बहुत ही अफसोस की बात है कि अब हम लोगों के जीवन को मीडिया प्लेटफॉर्म पर मनोरंजन के रूप में देखने लगे हैं| कहां रही हमारी निजता और क्या हमारा निजी जीवन केवल और केवल मनोरंजन का साधन मात्र बनकर रह गया | यह विचार मेरे खुद के हैं और यह विचार बार-बार मेरे ...

माँ दुर्गा को प्रिय लाल चुनरी

लाल चुनरी  ******** सुनो आज तुम्हें मैं,   मित्रों माता की कथा सुनाती हूं,   लाल चुनर लाल सिंदूर का,   महत्व आज मैं बताती हूं | दुष्ट राक्षसो से,  धरती रही थी कांप,  देवता भी विवश हुए,  किया मिलकर संताप  | त्रिदेवो ने मिलकर,  मां का किया आवाहन,   माता फिर प्रकट हुई,  सिंह को बनाया वाहन | दुष्टों का संहार करने माँ,   अष्ट भुजाओं वाली निकली,  दानव दल का वध करने ,   खड्ग उठा माता चली| युद्ध अंत में माता का,  तन था रक्त रक्तरंजित ,  लाल रक्त देख माता,  ह्रदय से हुई मुदित | तभी से ही माता को,  लाल रंग है भाते,  मां को खुश करने भक्त,   लाल चुनर है चढ़ाते | स्वेता गुप्ता "स्वेतांबरी"(कोलकाता) स्वरचित /मौलिक