आज बड़े दिनों बाद कालीघाट जाने का अवसर मिला मां के दर्शन की बड़ी इच्छा थी, सोचा कि चलो नवरात्रि के शष्टि के दिन मां के दर्शन कर आएं | भक्ति भावना से परिपूर्ण होकर मां के दर्शन हेतु मंदिर के प्रांगण में पहुंच तो गई पर कुछ तो वहां की कुव्यवस्था, पंडाओं के मनमाना दक्षिणा वसूलने की स्थिति को देखकर मन बहुत उदास था | लग रहा था कि अब वर्तमान के समय में हर जगह व्यापारियों का बोलबाला हो रहा है चाहे वह कोई भी स्थान क्यों ना हो! वी आई पी दर्शन के नाम पर, वी आई पी लाइन के नाम पर जितने भी श्रद्धालु वहां पहुंचे थे उनसे मनमाना रकम वसूलना व्यापार नहीं तो क्या है ? और सबसे बड़ी विडंबना की बात तो यह है कि यह सब कुछ प्रशासन के सामने उनके समक्ष हो रहा था| जब किसी श्रधालू ने उनसे पूछा कि सर क्या यह वी आई पी जैसी भी कोई व्यवस्था है क्या? तो उन्होंने कहा हमें इसके बारे में कुछ नहीं पाता जबकि ठीक उनके सामने बिल्कुल सामने यह सारी व्यवस्था चल रही थी |
खैर मन मसोस कर माँ के दर्शन हेतु वहाँ गई थी, बस उसी श्रद्धा को मन में रखते हुए किसी तरह अंदर पहुंची तो,जो चित्र मैंने यहां प्रस्तुत किया है वहां मेरी हिंदी की दुर्दशा को देखकर मन ग्लानी से भर उठा कि हम हिंदी प्रेमी हिंदी के लिए कुछ नहीं कर पा रहे हैं| बंगाल में हिंदी की इतनी खराब स्थिति होगी यह कभी सोचा नहीं था | एक सार्वजनिक स्थान पर इस तरह का साइन बोर्ड हिंदी की दुर्दशा को व्यक्त कर रहा था और हम हाथ बंधे चुपचाप बस उसे पढ़ रहे थे मुझे समझ में नहीं आता जब सारी व्यवस्था इतनी अच्छी तरीके से करने का हम ढिंढोरा पीटते हैं तो, हम इस तरह के साइन बोर्ड को जनता के सामने प्रस्तुत करके कैसा उदाहरण दे रहे हैं | वहां केवल बंगाल की ही जनता नहीं जाती होगी, देश-विदेश के कितने ही पर्यटक श्रद्धालु गण वहां पहुंचते होंगे,मैं इससे बहुत आहत हूं |आज इस दुख को मैं अपने इस ब्लॉग के माध्यम से आप सभी के समक्ष प्रस्तुत कर रही हूं, और आप सब की प्रतिक्रिया से जानना चाहती हूं की हमें इसके लिए क्या करना चाहिए? कौन सा पथ को अपनाना चाहिए? धन्यवाद!
@स्वेता गुप्ता
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