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नवंबर, 2020 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

अपनों से बढ़ती दूरियां

विभा बहुत परेशान है,बगल में चाची जी के फ़्लैट से बहुत जोर की बदबू आ रही है | वह बिल्डिंग के सेक्रेटरी के पास जाकर शिकायत करती है कि घर के बगल में रहनेवाली उसकी चिड़चीड़ी चाची के फ़्लैट से बहुत जोर की बदबू आ रही है | सेक्रेटरी के पास और भी लोग इस बात की शिकायत लेकर पहुंचे हुए थे |सेक्रेटरी  आनन -फानन में इस बात का पता लगाने के लिए चाची जी के घर का  दरवाजा जोर-जोर से खटखटाते हैं| बैल भी बजाते हैं,पर दरवाजा नहीं खुलता | दरवाजा भीतर से बंद है, दरवाजे के बाहर रोज का अखबार दूध की तीन चार बोतलें ऐसे ही पड़े हुए हैं | सेक्रेटरी को ना जाने क्या सूझता है,वह तुरंत पुलिस को कॉल करते हैं| पुलिस आती और दरवाजा तोड़ दिया जाता है | अंदर का नजारा देखकर सभी स्तब्ध रह जाते हैं  | चाची जी कुर्सी पर लुढ़की हुई मृत पाई जाती है | विभा को काटो तो खून नहीं मन में जाने कौन सा रंज बैठा कर उसने चाची जी से बात करना छोड़ दिया था | चाची जी अकेली,कोई संतान नहीं | अकेली ही वहां रहती थी | यही कारण था कि उनसे कोई बात करने वाला नहीं था | चिड़चिड़ी हो गई थी बुढ़ापे के कारण,चाचाजी भी वर्षों पहले परलोक सिधार गए थे...

तुलसी विवाह महिमा

आओ एक कथा सुनाए  विवाह तुलसी की कराए  मंडप सुन्दर सा सजाए  महिमा एकादशी गाए शिव तेज सागर फेंका  बालक जन्मा ना नेका जालंधर नाम पड़ा था  वो कारण भू कांपा था  वृंदा से परिणय बंधकर  मद मस्त था वो जालंधर लक्ष्मी पाने का हठकर युद्ध करें वो भयंकर  सागर पुत्री थी माता लो मान लिया भ्राता लालच बढ़े था हठी का पाने मां पार्वती  का महादेव  रूप धरा था छलिया दुष्ट बड़ा था मां योगबल से पहचाना शीघ्र हो अंतरध्याना सारी घटना सुनाया केशव को बात बताया थी अनन्य रागी वृंदा  ना सुने जलंधर निंदा पति धर्म जो भंग करेगा वो जलंधर तभी मरेगा माधव ऋषि रूप धारे  वृंदा को जा पुकारे  सतीत्व भंग कर डाला था वो दिवस जो काला लीला वृंदा जब जाने मोहन हृदय हीन माने भर गईं कोप से सीता श्राप लगा दिया तीता सकल देव अब पुकारे सब काल तेरे सहारे  ले वापस श्राप पवित्रा हो गई भस्म वो चित्रा एक लौ फूटा वहां पर दल तुलसी था जहां पर विष्णु प्रिया बनी वो लक्ष्मी सा रूप धरे वो विवाह  तुलसी  करे है केशव सब पाप हरे है स्वेता गुप्ता "स्वेतांबरी"(कोलकाता) स्वरचित /मौल...

एक नया दीपोत्सव मनाते है...!

चलो एक नया दीपोत्सव मानते है,  अंतस में बैठा अंधकार मिटाते हैं| दीपों भरी दिवाली हर वर्ष हमने मनाया , सच को झूठ के पर्दों में खूब छिपाया  | राम ने वचनों की खातिर चौदह वर्ष वारा था, सीताहरण घृण्य कार्य पर रावण को मारा था| अब तो वचनों की बातें पल में झुठलाते  हैं, दिन के उजाले में भी सीता हर ले जाते हैं | सुग्रीव सुदामा जैसे मित्र कहां अब हम  पाएंगे , बीच बाजार वो दोहरा चरित्र दिखलाएँगे | चकाचौंधी आकर्षण में अपनी जड़ें भुला गए, हम थे हम ही रहेंगे नजरिया दिखला गए | मान अनुजा के हेतू सीता हरा था रावण ने, था दंभी फिर भी बंधा था मर्यादा के दामन ने | कलयुग है या भटयुग कौन सा युग है ये, मिलते नहीं रावण जैसे भी जाने कैसा जुग है ये | दीपों के उजाले लें अंधकार हम मिटाते हैं, दिवाली में जाने कितने भूखे पेट सो जाते हैं| कुछ तो सोचो बारे उनके जो त्यौहार नहीं मना पाए, अपनी धरा से जुड़ कर भी संस्कार नहीं अपना पाए| क्या भगवत गीता की बातें कागज में सिमटी जाएगी, मझधार में भटकती नैया भी क्या  पार लगाएगी | अंकुश नहीं वाणी में सम्मान कहां से पाओगे, गड्ढा खोदा जिसका तुमने स्वयं ही गिर...

नई शिक्षा नीति एक विचार

शिक्षा प्राप्ति अर्थात केवल किताबी पठन-पाठन ही नहीं, बौद्धिक, मानसिक और नैतिक शिक्षा विकास से है | भारत सरकार द्वारा 2020 में प्रस्तावित नई शिक्षा नीति लगभग 34 वर्षों के पश्चात शिक्षा परिदृश्य में एक महत्वपूर्ण कदम है| अभी इसे बदलाव नहीं कहेंगे तो और क्या कहेंगे, कि मानव संसाधन मंत्रालय का नाम शिक्षा मंत्रालय कर दिया गया, जो कि एक समुचित कदम है तो है ही तथा शिक्षा के लिए अलग मंत्रालय की सोच सरकार का शिक्षा के प्रति समर्पण भाव दर्शाता है | जीडीपी का 6% शिक्षा में लगाने का लक्ष्य शिक्षा के आधारभूत ढांचे के निर्माण में बेहतर दिशा प्रदान करेगी, जो भारत की शिक्षा पद्धति को और समृद्ध और सुदृढ़ करेगी | इसी परिप्रेक्ष्य में 2030 तक 3 से 18 वर्ष के आयु वर्ग के प्रत्येक बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करने का लक्ष्य बनाया गया है| जो कि शिक्षा के प्रति उठाया गया एक ठोस कदम है | पुराने ढांचे 10+2 को बदलकर 5+3+3+4 पद्धति को लागू करने का विचार सराहनीय है | जिसमें 3 वर्ष तक के बच्चों को महत्वपूर्ण नैतिक शिक्षा दिया जा सकेगा, जिससे उनका मानसिक और बौद्धिक विकास होगा | अंग्रेजी माध्यम में पढ़ाने क...

अनाथ

कभी कभी जीवन में कुछ ऐसा अप्रत्यशित घटना घटित हो जाती है जिसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते |  ऐसे ही विद्यालय कार्य से मुक्ति पा बाजार जाना एक आदत सी बन गई थी | खरीदारी के शेष में एक बूढी माता जी से कभी -कभी  केले खरीदती थी| |वो माताजी पुरे बाजार में सबसे सस्ते केले बेचती थी | परन्तु कुछ दिनों से उन्हें  देख नहीं पा रही थी | उनके साथ वाली महिला मित्र से उन्हें ना देख पाने का कारण पूछा तो, जो जानकारी प्राप्त हुई उससे मन वेदना से भर उठा |  उन माताजी के चार बेटे हैं,  चारों ने विवाहोपरांत बूढ़ी माता जी को छोड़ दिया | कोई बहू  उन्हें साथ में नहीं रखना चाहती | इसलिए वह अपना भरण-पोषण अपने घर के पीछे लगे केले के पेड़ों से जो केले होते थे उन्हें बाजार में बेचकर अपनी जीविका चलाती थी |परंतु एक हफ्ते पहले हृदयाघात से उनकी मृत्यु हो गई कोई भी बेटा उनके अंतिम संस्कार में उपस्थित ना हो पाया,  या यूं कहें कोई नहीं आया |गांव के लोगों ने ही मिलकर उनका अंतिम संस्कार किया| यहां हम अनाथ विषय के ऊपर बात कर रहे हैं, अनाथ विषय पर अपनी लेखनी को प्रखर कर रहे हैं| परंतु उन लोगों ...