शिक्षा प्राप्ति अर्थात केवल किताबी पठन-पाठन ही नहीं, बौद्धिक, मानसिक और नैतिक शिक्षा विकास से है |
भारत सरकार द्वारा 2020 में प्रस्तावित नई शिक्षा नीति लगभग 34 वर्षों के पश्चात शिक्षा परिदृश्य में एक महत्वपूर्ण कदम है| अभी इसे बदलाव नहीं कहेंगे तो और क्या कहेंगे, कि मानव संसाधन मंत्रालय का नाम शिक्षा मंत्रालय कर दिया गया, जो कि एक समुचित कदम है तो है ही तथा शिक्षा के लिए अलग मंत्रालय की सोच सरकार का शिक्षा के प्रति समर्पण भाव दर्शाता है | जीडीपी का 6% शिक्षा में लगाने का लक्ष्य शिक्षा के आधारभूत ढांचे के निर्माण में बेहतर दिशा प्रदान करेगी, जो भारत की शिक्षा पद्धति को और समृद्ध और सुदृढ़ करेगी |
इसी परिप्रेक्ष्य में 2030 तक 3 से 18 वर्ष के आयु वर्ग के प्रत्येक बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करने का लक्ष्य बनाया गया है| जो कि शिक्षा के प्रति उठाया गया एक ठोस कदम है | पुराने ढांचे 10+2 को बदलकर 5+3+3+4 पद्धति को लागू करने का विचार सराहनीय है | जिसमें 3 वर्ष तक के बच्चों को महत्वपूर्ण नैतिक शिक्षा दिया जा सकेगा, जिससे उनका मानसिक और बौद्धिक विकास होगा |
अंग्रेजी माध्यम में पढ़ाने की ललक, जो आज भारत का हर एक परिवार करना चाहता है, चाहे वह किसी भी वर्ग का हो |जिससे मातृभाषा हिंदी का विकास समाप्त सा हो चुका था | यहां तक कि क्षेत्रीय भाषाओं तो महत्वहीन ही नजर आने लगे थे | इस शिक्षा नीति ने हिन्दी और क्षेत्रीय भाषाओं के लुप्त होते कगार में संभावनाओं के द्वार खोल दिये है | या यूं कहें इन में नवीनता का प्राण संचार कर दिया है | पांचवीं कक्षा तक या संभव हो सके आठवीं कक्षा तक का शिक्षण माध्यम मातृभाषा तथा स्थानीय क्षेत्रीय भाषाओं का प्रयोग करने की योजना बच्चों में सीखने की क्षमता को और मजबूत करेगा | उदाहरण स्वरूप -अगर जिस बच्चे को अंग्रेजी की बिलकुल भी समझ नहीं उस बच्चे को अंग्रेजी में आप मोबाइल रिपेयरिंग कराना सिखाएंगे तो वह कभी नहीं सीख पाएगा | लेकिन आप उसे उसकी क्षेत्रीय भाषा यह मातृभाषा में उस विधा को सिखाएंगे तो वह बहुत जल्दी सीखेगा , समझेगा और उसको सफल भी करेगा| उसी प्रकार से शिक्षण क्षेत्र में अगर आप किसी बच्चे को विज्ञान की जानकारी दे रहे हैं, और उसे उसकी क्षेत्रीय भाषा में दे रहे हैं, तो वो क्षेत्रीय भाषा में बहुत जल्दी ही समझ कर उस पर अपनी प्रतिक्रिया दे पाएंगा | इससे ये होगा की समझ और सीखने की क्षमता ज्यादा बढ़ेगी और हमारे देश में जो दबी हुई प्रतिभा है वह उभर कर सामने आएगी |
छठी कक्षा से वोकेशनल पाठ्यक्रम का प्रारंभ और इंटरनशिप करवाना शिक्षा के नए आयामों को एक नई दिशा प्रदान करेगी| जो बच्चा पाठ्यक्रम मैं अच्छे नहीं है, उस बच्चे को अवसर मिलेगा कि वह साहित्य, कला या किसी भी अन्य क्षेत्र में अपने आप को स्थापित कर पाए | साथ ही 10वीं एवं 12वीं बोर्ड परीक्षाओं का फॉर्मेट बदलकर वर्ष में दो बार किया जाना बस्तों का वजन कम करने जैसा कार्य किया गया है|
2035 तक उच्च शिक्षा में 50 फ़ीसदी ग्रॉस इनरोलमेंट रेशियों करना एक महत्वपूर्ण लक्ष्य है, जो कि वर्तमान में 26.3% है |इसी नीति में मल्टीपल एंट्री एग्जिट सिस्टम लागू किया गया है| जिससे उन छात्रों को लाभ होगा, जिन्होंने बीच में ही पढ़ाई किसी कारणवश छोड़ दी थी |
डिग्री प्रोग्राम में किया गया बदलाव, रिसर्च और नौकरी पाने हेतु किए गए पाठ्यक्रम को सुलभ बना रही है | सबसे महत्वपूर्ण कदम तो, ग्लोबल रेंक के यूनिवर्सिटी में पठन हेतु भारतीय विद्यार्थियों का पलायन रोकने के तहत, उन यूनिवर्सिटी की शाखाओं का भारत में ही खोलने का विचार, उन बच्चों के लिए भी अवसर है जो आर्थिक असमर्थता के कारण उन यूनिवर्सिटीज में पढ़ नहीं पाते थे | अब वह भी इस अवसर का लाभ उठा पाएंगे | नेशनल रिसर्च फाउंडेशन की स्थापना शोधार्थियों की संस्कृति को और सक्षम बनाएगी |
परंतु उसके क्रियान्वयन में मजबूत इच्छाशक्ति की आवश्यकता है | तीन संस्थाओं को एक संस्था बनाने के कारण विद्यालयों का स्वायत्तता बन जाना एक चुनौती को जन्म देगी | शिक्षा का माध्यम परिवर्तन में सबसे बड़ी समस्या उन अभिभावकों को होगा जो प्रायः नौकरी या किसी भी कारणवश उनका स्थानांतरण एक शहर से दूसरे शहर में होता है | इसके साथ ही बुनियादी अवसंरचना को मजबूत करना होगा जिससे वैश्विक स्तर की संरचना प्राप्ति को संभव बनाया जा सके| कुल मिलाकर देखा जाए तो नई शिक्षा नीति संभावनाओं को तो जन्म देती ही है, परन्तु साथ ही इसमें कुछ शोध और परिवर्तन करने की आवश्यकता है |
स्वेता गुप्ता "स्वेतांबरी"( कोलकाता )
स्वरचित /मौलिक

टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें