उम्र के इस मोड़ पर बिना पत्तों का दरख़्त हूँ तुम पतझड़ी मौसम सी सूखा समंदर हूं मैं संगिनी तुम अर्धांगिनी मीठास बेस्वाद सा हूँ तुम लहरों की सानी जज्बातों का समंदर हूं मैं तुम खिलती धूप सी मैं बरगद की छांव समय के अलबेले थपेड़ों में अपनेपन का बवंडर हूं मैं कौन कहता है उम्र बीत गई हाथों में तेरा हाथ हो तो तनती हर एक सांस तक मुकद्दर का सिकंदर हूं मैं! मुकद्दर का सिकंदर हूं मैं!! @स्वेता गुप्ता "स्वेताम्बरी"
स्वेता की रचनाएँ मेरी स्वयं की लिखी रचनाएँ है जो अप्रकाशित है | स्वेता की रचनाएँ मेरे मन के भाव है जो मैंने शब्दों में पिरो कर आप सभी के समक्ष प्रस्तुत कर रही हूँ | स्वेता की रचनाएँ पटल पर आने वाले और मेरी रचनाओं को पढ़ने वाले सभी पाठको का कोटिश आभार धन्यवाद |