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सिकंदर हूँ मैं

 उम्र के इस मोड़ पर बिना पत्तों का दरख़्त हूँ तुम पतझड़ी मौसम सी सूखा समंदर हूं मैं  संगिनी तुम अर्धांगिनी मीठास बेस्वाद सा हूँ  तुम लहरों की सानी  जज्बातों का समंदर हूं मैं  तुम खिलती धूप सी  मैं बरगद की छांव  समय के अलबेले थपेड़ों में  अपनेपन का बवंडर हूं मैं  कौन कहता है उम्र बीत गई हाथों में तेरा हाथ हो तो तनती हर एक सांस तक  मुकद्दर का सिकंदर हूं मैं! मुकद्दर का सिकंदर हूं मैं!! @स्वेता गुप्ता "स्वेताम्बरी"

लहर

 *लहर*  अब लहर का नाम सुनते ही ना जाने क्यों भयावह एक कुंठा ह्रदय में बैठ जाती है | एक अंजाना सा सुप्त भय अचानक से जागने लगता है | 22 फरवरी 1920 देश में राष्ट्र के नाम संदेश सुना ; एक अप्रत्याशित अंजाना सा *लॉकडाउन* लगा दिया गया | जिससे हम अनभिज्ञ थे | शिक्षित थोड़ा समझ भी रहे थे, परन्तु जो रोजी-रोटी ही शिक्षा मान रहे थे उनके लिए तो विपदाओं का बहुत ही ऊंचा पहाड़ उन पर गिर पड़ा था |  चारों और भय का वातावरण, उस वातावरण में घुट घुट कर जीती जिंदगी! ऐसी जिंदगी जो समय सीमा में बंध गई थी| *मास्क* नाम का आवरण चेहरे पर चढ़ा दिया गया था | लगता था जैसे हम उधार का जीवन जी रहे हैं | लोग मर रहे थे, और अफवाहों का बाजार यूँ सज रहा था *सुबह उन्हें स्वस्थ देखा पर शाम को वह गुजर गए*  *ये करोना वरोंना कोई बीमारी नहीं सोची समझी साजिश है* *फंला वर्ग के लोगों ने हमारे वर्ग को मिटाने के लिए षड्यंत्र रचा है*|  पूरा विश्व इस त्रासदी से जूझ रहा था | एशिया के किन्हीं देशों में हजारों में लोग प्रतिदिन मर रहे थे | कोई दवा काम नहीं कर रही थी | केवल अनुमान व अनुभव से इलाज किया जा रहा था|  ल...