चलो एक नया दीपोत्सव मानते है,
अंतस में बैठा अंधकार मिटाते हैं|
दीपों भरी दिवाली हर वर्ष हमने मनाया ,
सच को झूठ के पर्दों में खूब छिपाया |
राम ने वचनों की खातिर चौदह वर्ष वारा था,
सीताहरण घृण्य कार्य पर रावण को मारा था|
अब तो वचनों की बातें पल में झुठलाते हैं,
दिन के उजाले में भी सीता हर ले जाते हैं |
सुग्रीव सुदामा जैसे मित्र कहां अब हम पाएंगे ,
बीच बाजार वो दोहरा चरित्र दिखलाएँगे |
चकाचौंधी आकर्षण में अपनी जड़ें भुला गए,
हम थे हम ही रहेंगे नजरिया दिखला गए |
मान अनुजा के हेतू सीता हरा था रावण ने,
था दंभी फिर भी बंधा था मर्यादा के दामन ने |
कलयुग है या भटयुग कौन सा युग है ये,
मिलते नहीं रावण जैसे भी जाने कैसा जुग है ये |
दीपों के उजाले लें अंधकार हम मिटाते हैं,
दिवाली में जाने कितने भूखे पेट सो जाते हैं|
कुछ तो सोचो बारे उनके जो त्यौहार नहीं मना पाए,
अपनी धरा से जुड़ कर भी संस्कार नहीं अपना पाए|
क्या भगवत गीता की बातें कागज में सिमटी जाएगी,
मझधार में भटकती नैया भी क्या पार लगाएगी |
अंकुश नहीं वाणी में सम्मान कहां से पाओगे,
गड्ढा खोदा जिसका तुमने स्वयं ही गिर जाओगे|
धर्म नाम अपना लोगों को तुमने जैसे है बांटा,
समय है संभल जाओ वरना आएगा ज्वार भाटा|
जाने कितने ही दिये तुमने यूं ही है जलाया,
क्या किसी गरीब संग दिवाली है मनाया |
स्वेता गुप्ता "स्वेतांबरी"(कोलकाता)
स्वरचित /मौलिक

बहुत ही यथार्थ वर्णन आदरणीया,निस्सन्देह महापण्डित रावण ने सीता का हरण किया ।पर ये अपनी बहन शूर्पनखा के मान के लिए किया था,परन्तु उन्होंने मर्यादा का पालन किया,पर आज हम सबने इस बात को चरितार्थ किया कि हम नहीं सुधरेंगे।
जवाब देंहटाएंरावण ने सीता का हरण छल से किया,परन्तु आज की परिस्थिति तो कुछ और ही है।
यथार्थ सृजन के लिए हार्दिक शुभकामनाएं।🙏🌹🙏
सादर आभार 🙏
हटाएंबहुत सुन्दर
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