आओ एक कथा सुनाए
विवाह तुलसी की कराए
मंडप सुन्दर सा सजाए
महिमा एकादशी गाए
शिव तेज सागर फेंका
बालक जन्मा ना नेका
जालंधर नाम पड़ा था
वो कारण भू कांपा था
वृंदा से परिणय बंधकर
मद मस्त था वो जालंधर
लक्ष्मी पाने का हठकर
युद्ध करें वो भयंकर
सागर पुत्री थी माता
लो मान लिया भ्राता
लालच बढ़े था हठी का
पाने मां पार्वती का
महादेव रूप धरा था
छलिया दुष्ट बड़ा था
मां योगबल से पहचाना
शीघ्र हो अंतरध्याना
सारी घटना सुनाया
केशव को बात बताया
थी अनन्य रागी वृंदा
ना सुने जलंधर निंदा
पति धर्म जो भंग करेगा
वो जलंधर तभी मरेगा
माधव ऋषि रूप धारे
वृंदा को जा पुकारे
सतीत्व भंग कर डाला
था वो दिवस जो काला
लीला वृंदा जब जाने
मोहन हृदय हीन माने
भर गईं कोप से सीता
श्राप लगा दिया तीता
सकल देव अब पुकारे
सब काल तेरे सहारे
ले वापस श्राप पवित्रा
हो गई भस्म वो चित्रा
एक लौ फूटा वहां पर
दल तुलसी था जहां पर
विष्णु प्रिया बनी वो
लक्ष्मी सा रूप धरे वो
विवाह तुलसी करे है
केशव सब पाप हरे है
स्वेता गुप्ता "स्वेतांबरी"(कोलकाता)
स्वरचित /मौलिक

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