कभी कभी जीवन में कुछ ऐसा अप्रत्यशित घटना घटित हो जाती है जिसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते |
ऐसे ही विद्यालय कार्य से मुक्ति पा बाजार जाना एक आदत सी बन गई थी |
खरीदारी के शेष में एक बूढी माता जी से कभी -कभी केले खरीदती थी| |वो माताजी पुरे बाजार में सबसे सस्ते केले बेचती थी | परन्तु कुछ दिनों से उन्हें देख नहीं पा रही थी |
उनके साथ वाली महिला मित्र से उन्हें ना देख पाने का कारण पूछा तो, जो जानकारी प्राप्त हुई उससे मन वेदना से भर उठा |
उन माताजी के चार बेटे हैं, चारों ने विवाहोपरांत बूढ़ी माता जी को छोड़ दिया | कोई बहू उन्हें साथ में नहीं रखना चाहती | इसलिए वह अपना भरण-पोषण अपने घर के पीछे लगे केले के पेड़ों से जो केले होते थे उन्हें बाजार में बेचकर अपनी जीविका चलाती थी |परंतु एक हफ्ते पहले हृदयाघात से उनकी मृत्यु हो गई कोई भी बेटा उनके अंतिम संस्कार में उपस्थित ना हो पाया, या यूं कहें कोई नहीं आया |गांव के लोगों ने ही मिलकर उनका अंतिम संस्कार किया|
यहां हम अनाथ विषय के ऊपर बात कर रहे हैं, अनाथ विषय पर अपनी लेखनी को प्रखर कर रहे हैं| परंतु उन लोगों का क्या जिनके पास भरा पूरा संसार होते हुए भी, वह अनाथों की तरह अंतिम सांसे लेते हैं |उनका क्या? क्या वह अनाथ नहीं है?
स्वेता गुप्ता "स्वेतांबरी"(कोलकाता)
स्वरचित /मौलिक
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