सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

हिन्दी अभेद दीवार




 "हिंदी देश के सबसे बड़े भूभाग में बोली जाने वाली भाषा है और राष्ट्रभाषा कहलाने की अधिकारिणी है"
 यह कथन नोबेल पुरस्कार विजेता आदरणीय श्री रविंद्र नाथ टैगोर जी का है| बंगाल की भूमी में जन्मे और अपने कला क्षेत्र के लिए पूरे विश्व में प्रसिद्धि पाने वाले बंगाल के साहित्य शिरोमणि, हिंदी को प्रमुखता देते थे| कितने आश्चर्य की बात है कि उन्हीं की जन्मभूमि में हिन्दी के साथ भेदभाव हो रहा है|
 जब यह समाचार सामने में आया कि बंगाल सिविल सर्विस परीक्षा में हिंदी को हटाया जा चुका है, तो दोबारा आँख मलते हुए समाचार को पढ़ा मैंने | अविश्वसनीय सा लगता है |ऐसा कैसे हो सकता है? जिस धरती पर हिंदी की अनेक संस्थाएँ जो अब तक हिंदी की सेवा में संलग्न है और उतनी ही तत्परता से हिंदी की सेवा करती आ रही है | उसी बंगाल की धरती पर हिन्दी के प्रति ऐसा भेदभाव |
 विविधता में एकता का देश है हमारा, यहां क्षेत्रीय भाषा को उतना ही सम्मान मिलता है जितना कि राष्ट्रीय भाषा को मिलता है | गैर बंगालियों और हिंदी भाषियों ने बंगाल की उन्नति और विकास में उतना ही सहयोग दिया है जितना बंगाल वासी देते हैं| फिर ऐसा भेदभाव क्यों?
 केवल हिंदी प्रकोष्ठ खोल कर क्या साबित किया जा रहा है,कि हम हिंदी की भाषा को मान्यता देते हैं| अगर मान्यता देते हैं तो, हिंदी भाषा के प्रति सिविल सर्विस परीक्षाओं में ऐसा भेदभाव क्यों?आप इस बात से कतई नकार नहीं सकते कि हिंदी भारत में सबसे ज्यादा तबके में बोली जाने वाली, बोलचाल की भाषा है| और यह भी क्या संयोग की बात है कि हिंदी और बंगाली की बोली में कई समानताएं देखने को मिलती है, फिर भी ऐसा क्यों?आप उन भविष्य का क्या करेंगे जिन्होंने पूरे वर्ष हिंदी भाषा में सिविल सर्विसेज परीक्षाओं की तैयारी कर रखी है |उनके भविष्य का क्या होगा?
 यह किस प्रकार का वैचारिक मत है जिसमें हिंदी को दोयाम दर्जा दिया जा रहा है| क्या यह द्वेषपूर्ण व्यवहार नहीं? क्या हमारे बीच रोष पैदा करने की साजिश नहीं की जा रही है? बंगाल के सरकारी और गैर सरकारी शिक्षण संस्थाओं में हिन्दी को पहली या दूसरी भाषा का दर्जा दिया जाता है| बंगाली भाषा के छात्र हिंदी को तीसरी भाषा में रख उसका पठन-पाठन बहुत रूचि के साथ करते है |  फिर इस प्रकार का निर्णय करना उनके भविष्य के साथ खिलवाड़ नहीं है?
 जिस धरती पर राहुल सांकृत्यायन, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, लल्लू लाल जी, मृदुला गर्ग,जय गोस्वामी आदि जैसे हिंदी साहित्य के शिरोमणि जन्मे हैं | जिन्होंने बंगाल का नाम अपने हिंदी सेवा से अमर कर दिया हो| वहाँ हो रहे इस भेदभाव  का हम पुरजोर विरोध करते हैं, पूर्णतया बहिष्कार करते हैं|
 निज भाषा उन्नति अहै,
 सब उन्नति को मूल |
बिन निज भाषा ज्ञान के,
 मिटे न हिय को शूल |
भारतेंदु हरिश्चंद्र द्वारा रचित हिंदी को समर्पित यह पंक्तियां हमारी वेदना को प्रकट करने में सार्थक प्रतीत होती हैं| इस दुर्भाग्यपूर्ण निर्णय से लाखों बच्चों का भविष्य निराशा के गर्त में चला जाएगा| हमें इस निर्णय पर गहन चिंतन करने की आवश्यकता है |

अंत में यही कहना चाहूंगी हिंदी कोई पशु या जीव नहीं जो इस प्रकार के निर्णय से विलुप्त हो जाए |हिंदी एक सशक्त और अपने आप अभेद दिवार है,जो सबके हृदय में अपनी एक पहचान रखती है| आप कागजों से हिंदी को दूर कर सकते हैं, मिटाने का प्रयास कर सकते हैं, परंतु ह्रदय से नहीं!

@स्वेता गुप्ता "स्वेताम्बरी"

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

31वाँ हिंदी मेला

विगत कई वर्षों से गीता दी ( गीता डूबे) और शिप्रा दी ( डॉ शिप्रा मिश्रा) मुझे हिंदी मेले के विषय में बताती रही थी,और दोनों विभूतियों का यही प्रश्न था कि "आप हिंदी मेला क्यों नहीं जाती हो' | क्योंकि नौकरी पेशा, शिक्षिका हूं तो घर की जिम्मेदारियां अपने कर्म क्षेत्र की जिम्मेदारी मुझे रोकती रही | सौभाग्यवश इस वर्ष मुझे इस मेले में शिरकत करने का समय और अवसर भी मिल गया | हिंदी मेला की सदस्यता प्राप्त करके हिंदी मेले में जाना प्रारंभ किया कई कार्यक्रमों की रूपरेखा मैंने देखा, और सभी को इन कार्यक्रमों की तैयारी बड़े ही लग्न के साथ करते हुए देखा , इस मेले में बड़े-बड़े साहित्यकारों का जमावड़ा देखा और क्योंकि 26 तारीख को यह कार्यक्रम प्रारंभ होने वाला था और 1 जनवरी तक यह कार्यक्रम चलता तो 26 को मेरी एक और कार्यक्रम थी रिसड़ा में जिसके कारण में प्रथम दिवस मेले में उपस्थित नहीं रह सकी, किंतु उसके बाद 27 दिसंबर 2025 से मैं लगातार प्रतिदिन मेले में शिरकत करती रही | उसके समापन दिवस तक भी मेले में मेरी उपस्थित रही, हालांकि ज्यादा देर तक रुक ना सकी |  कोलकाता के विद्यालयों में शिक्ष...

हाय मेंरी हिंदी!

 आज बड़े दिनों बाद कालीघाट जाने का अवसर मिला मां के दर्शन की बड़ी इच्छा थी, सोचा कि चलो नवरात्रि के शष्टि के दिन मां के दर्शन कर आएं | भक्ति भावना से परिपूर्ण होकर मां के दर्शन हेतु मंदिर के प्रांगण में पहुंच तो गई पर कुछ तो वहां की कुव्यवस्था, पंडाओं के मनमाना दक्षिणा वसूलने की स्थिति को देखकर मन बहुत उदास था | लग रहा था कि अब वर्तमान के समय में हर जगह व्यापारियों का बोलबाला हो रहा है चाहे वह कोई भी स्थान क्यों ना हो! वी आई पी दर्शन के नाम पर, वी आई पी लाइन के नाम पर जितने भी श्रद्धालु वहां पहुंचे थे उनसे मनमाना रकम वसूलना व्यापार नहीं तो क्या है ? और सबसे बड़ी विडंबना की बात तो यह है कि यह सब कुछ प्रशासन के सामने उनके समक्ष हो रहा था|  जब किसी श्रधालू ने उनसे पूछा कि सर क्या यह वी आई पी जैसी भी कोई व्यवस्था है क्या? तो उन्होंने कहा हमें इसके बारे में कुछ नहीं पाता जबकि ठीक उनके सामने बिल्कुल सामने यह सारी व्यवस्था चल रही थी |  खैर मन मसोस कर माँ के दर्शन हेतु वहाँ गई थी, बस उसी श्रद्धा को मन में रखते हुए किसी तरह अंदर पहुंची तो,जो चित्र मैंने यहां प्रस्तुत क...

निजता रही क्या?

आभासी पटल बड़ा मजेदार लगता है| फेसबुक, इंस्टाग्राम,युटुब आदि जाने ही कितने आभासी पटल है,जिसमें मैं अक्सर देखती हूं लोग अपने खाने के, घूमने के अक्सर फोटो डालते रहते हैं | क्या यह निजता का हनन नहीं है? ये प्रश्न बार-बार मेरे मन में कौंधता रहता है | एक अंग्रेजी में शब्द है privacy क्या य इस शब्द की महत्ता रही हमारे जीवन में | हम अक्सर इन मीडिया प्लेटफॉर्म पर देखते हैं कि लोग दिनचर्या के भी वीडियो और फोटोस डालते रहते हैं, क्या यह सही है? कि हम अपनी दैनिक क्रिया को भी इन मीडिया प्लेटफॉर्म पर मनोरंजन के रूप में डालें, क्या हम मनोरंजन के पात्र बनकर रह गए हैं? लाइक, कॉमेंट्स और फॉलोअर्स बढ़ाने के लिए हम भूल गए हैं की एक समय था जब लोग हमें जानने के लिए हमें पहचानने के लिए हमसे मिलने आते थे, वार्तालाप होते थे, परिचर्चाऐं होती थी| किंतु यह बहुत ही अफसोस की बात है कि अब हम लोगों के जीवन को मीडिया प्लेटफॉर्म पर मनोरंजन के रूप में देखने लगे हैं| कहां रही हमारी निजता और क्या हमारा निजी जीवन केवल और केवल मनोरंजन का साधन मात्र बनकर रह गया | यह विचार मेरे खुद के हैं और यह विचार बार-बार मेरे ...