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आज का कवि साहित्यकार इतना अधीर क्यूँ????

 एक साहित्यकार समाज में हो रहे राजनैतिक, सामाजिक परिस्थितियों को, अपने मनोभावों को रचनाओं के माध्यम से  सजा कर प्रस्तुत करता है | समाज में घटित घटनाओ पर चिंतन मनन कर अपने  विचारों को अपनी लेखनी द्वारा प्रस्तुत करता है|  पर आज के वर्तमान समय में कितने साहित्यकार और कवि है जिनमे एक होड़ सी लगी है |आगे बढ़नेके क्रम में उन्हें कविता की गुणवत्ता से कम मान पत्रों पर ज्यादा विशेष ध्यान रहने लगा है| या यूं कहें कि साहित्य क्षेत्र का पायदान धरातल की तरफ जाता जा रहा है | अभी करोना के समय में जिस प्रकार से साहित्य को एक मीडिया प्लेटफॉर्म मिला है, यह एक सकारात्मक पक्ष कह सकते हैं| जिसमें बहुत से लोग जो इन क्षेत्रों से जुड़े हो कर भी कलमकारी से दूर थे |अब इस मीडिया प्लेटफॉर्म के द्वारा उन्हें साहित्य से जुड़ने का अवसर मिला है |अपनी लेखनी अपनी रचनाओं को पटल पर विश्व के समक्ष प्रस्तुत करने का अवसर  मिला है | परंतु नकारात्मक पक्ष भी है कि मीडिया प्लेटफॉर्म में किस प्रकार से एक ही विषय पर एक ही रचनाकार दो तीन रचनाएं लिखते हैं, और उसी विषय पर और भी कई रचनाकार अपनी रचनाएं प्रस्तुत ...

नवरात्रि "" माँ के नौ रूप""

" प्रथमा शैलपुत्री "  मां पर्वतराज पुत्री,  एक हाथ त्रिशूल विराजे,  दूजे में कमल पुष्प,  नवदुर्गा में प्रथमा दुर्गा,  योग साधना का दिखाएं रूप ! " द्वितीय ब्रह्मचारिणी "  अत्यंत भव्य ज्योतिर्मय रूप,  मां तप आचरण करने वाली,  जप की माला कमंडल ले,  त्याग वैराग्य का देती स्वरूप ! " तृतीय चंद्रघंटा "  मस्तक अर्धचंद्र विराजे,   सिंह वाहिनी स्वर्ण मुखी मां,   कष्टों को हर लेती मैया,   उपासना की देती अनुकंपा ! " चतुर्थी कुष्मांडा"  मृदुल मुस्कान ब्रह्मा उत्पन्नी,   भवसागर का दिखाती मार्ग,   सुगम श्रेयस्कर अलौकिक,   सुख को देने वाली समृद्धि,   उन्नति की देती अनुकंपा ! " पंचमा स्कंदमाता "  कमल आसन विराजने वाली,  पद्मासन देवी कहलाती,  कार्तिकेय की माता,  साधक को देती आशीष ! " षष्टी कात्यायनी " अमोघ फलदायनी,  कठिन तप ऋषि घर जन्मी,  अलौकिक तेज की स्वामिनी,  सहजता का देती अनुकंपा ! " सप्तम कालरात्रि " रूप कराली शुभड्करी,  सिद्दी की देवी,...

हिन्दी

निज भाषा विश्वास जगाती हिंदी,  सहज, शब्द, अतुल्य भंडार ये हिंदी ! हजारों वर्ष पुरानी अपभृंश ये हिंदी,  नीति, श्रृंगार, शौर्य की हिंदी ! आर्यों की परिभाषित हिंदी,  अवहट्ट, चंद्रधर गुलेरी की हिंदी ! आदिकाल,भक्तिकाल,आधुनिक काल की हिंदी,  खड़ी बोली इतिहास की हिंदी! तुलसी, जायसी कवियों की हिंदी,   मीरा की भक्ति में हिंदी!  सूर के पद हो या दोहे कबीर के,  समाज को दिशा दिखाती हिंदी! लघुकथा, उपन्यास,  मुक्तक सी  हिंदी,  भारतेंदु, निराला, प्रेमचंद की हिंदी!  गौरव गाथा सरल बना,  जन जन तक पहुंचाती हिंदी!  शौरसेनी, अर्धमागधी से प्रकटी हिंदी,   राष्ट्रभाषा हमारी हिंदी....! स्वेता गुप्ता "स्वेतांबरी"

भ्रांतियाँ

हम भटकाव की तरफ जा रहे हैं| यह भटकन ऐसी है जिसका कोई ओर है ना छोर |अब मेरे इस कथन का आपको मैं सार समझाती हूं |सर्वप्रथम देश में हो रहे घटनाओं को अपने निजी लाभ के लिए तोड़ मरोड़ कर दूसरी दिशा देते हुए आम लोगों के सामने प्रस्तुत किया जा रहा है| बिना किसी घटना के तह तक गए, बिना उस घटना से संबंधित सत्यता की जांच किए हम आम लोगों के सामने ऐसे कथनों को प्रस्तुत कर रहे हैं, जिससे मानव भटक रहा है |अब हालात इस तरह से बिगड़ रहे हैं कि विश्वास कमजोर होता जा रहा है|  अब हाथरस की घटनाओं को ही ले लें , समाचार से संबंधित चैनलों को देखें हर चैनल के अपने नियम हैं, हर चैनल उस घटना को अपने तरीके से प्रस्तुत कर रहा है |उन्हें टीआरपी चाहिए, उन्हें अपना चैनल को सबसे ऊंचे पायदान पर चाहिए| प्रतिस्पर्धा चैनलों के बीच इतनी बढ़ गई है कि अगर घटना सच्ची है, तो भी आपसी प्रतिस्पर्धा के कारण एक घटना को सत्य बताएगा, तो दूसरा घटना से संबंधित बातों को इस तरह से तोड़ मरोड़ कर प्रस्तुत करेगा जैसे कि वह घटना सत्य नहीं असत्य है| अब इस करोना काल के समय में अधिकाधिक मानव अपने घर में हैं, और इन्हीं न्यूज़ चैनलों ...

संगीत

संगीत  ***** सात सुरों के सरगम, जन्म लें संगीत,  माता वीणा वादिनी, देती आशीष | सूर लय ताल मिल, नव उदय हो गीत,  माता शारदा का, मिलता शुभाशीष | छंद, मुक्तक, दोहे, नित नये सोपान,  माँ वीणापाणि, दे हमें वरदान | स्वेता गुप्ता "स्वेतांबरी"(कोलकाता) स्वरचित / मौलिक 

वर्तमान समय में शिक्षा एवं शिक्षक की भूमिका

गुरुर ब्रह्मा गुरुर विष्णु गुरुर देवो महेश्वर:, गुरुर साक्षात परम ब्रम्ह तस्मै श्री गुरुवे नमः|| भारत की सभ्यता संस्कृति में गुरु को देवता तुल्य समझा जाता है| गुरु का शाब्दिक अर्थ है अंधेरे से उजाले की तरफ ले जाना अर्थात,  पथ प्रदर्शक दिशाहीन को दिशा दिखाना | परंतु वर्तमान समय में शिक्षक और शिक्षा दोनों ही पर ही   बदलाव का प्रभाव पड़ा है| शिक्षा प्राप्त करना अर्थात अच्छी नौकरी प्राप्त करना , जबकि  शिक्षक शिक्षा जैसे दान कार्य को एक व्यवसाय के रूप में देखने लगे है | शिक्षा देना और शिक्षा प्राप्त करना धन कमाने का साधन मात्र  बनकर रह गया है |शिक्षक और शिक्षा किसी भी समाज के सर्वांगीण विकास का आधार स्तम्भ होती है, परंतु शैक्षणिक संस्थान सरकारी हों या गैर सरकारी बेहतर सुविधाओं के बदले धन अर्जन करना, एक साधन मात्र लक्ष्य बन गया है |आज किसी भी शिष्य को प्रगति के पथ पर अग्रसर होता देख शिक्षक गौरवान्वित होते हैं | परन्तु कुछ शिक्षकों का शिक्षण के प्रति उदासीनता का भाव मन को  आहत करता है |आज के समय में शिक्षकों का शिक्षा के प्रति विमनस्क भाव के कारण उनके ...

गणपति वंदन

गौरी सूत बलशाली  विधावार्धि गणनायक | नमन करुँ पद कमल समाना || हे, कपिल कृपाकर नंदन | देवातकनाशी करें जग कल्याना || सर्वसिद्धांता विघ्नविनाशन | विनायक श्वेत रूप समाना || हे, विधावारिधि उमा प्रिये | शुभगुणकानन कीर्ति समाना || स्वेता गुप्ता "स्वेतांबरी"(कोलकाता) स्वरचित /मौलिक