गुरुर ब्रह्मा गुरुर विष्णु गुरुर देवो महेश्वर:, गुरुर साक्षात परम ब्रम्ह तस्मै श्री गुरुवे नमः||
भारत की सभ्यता संस्कृति में गुरु को देवता तुल्य समझा जाता है| गुरु का शाब्दिक अर्थ है अंधेरे से उजाले की तरफ ले जाना अर्थात, पथ प्रदर्शक दिशाहीन को दिशा दिखाना | परंतु वर्तमान समय में शिक्षक और शिक्षा दोनों ही पर ही बदलाव का प्रभाव पड़ा है| शिक्षा प्राप्त करना अर्थात अच्छी नौकरी प्राप्त करना , जबकि शिक्षक शिक्षा जैसे दान कार्य को एक व्यवसाय के रूप में देखने लगे है | शिक्षा देना और शिक्षा प्राप्त करना धन कमाने का साधन मात्र बनकर रह गया है |शिक्षक और शिक्षा किसी भी समाज के सर्वांगीण विकास का आधार स्तम्भ होती है, परंतु शैक्षणिक संस्थान सरकारी हों या गैर सरकारी बेहतर सुविधाओं के बदले धन अर्जन करना, एक साधन मात्र लक्ष्य बन गया है |आज किसी भी शिष्य को प्रगति के पथ पर अग्रसर होता देख शिक्षक गौरवान्वित होते हैं | परन्तु कुछ शिक्षकों का शिक्षण के प्रति उदासीनता का भाव मन को आहत करता है |आज के समय में शिक्षकों का शिक्षा के प्रति विमनस्क भाव के कारण उनके सामाजिक स्थान और गरिमा में गिरावट आई है | उन्हें अपने दायित्वों के निर्वाहन को समझना होगा कि भविष्य का निर्माण उन्ही के हाथों में है| "गुरु गोविंद दोऊ खड़े काको लागूं पाय, बलिहारी गुरु आपनों जो गोविंद दियो बताए" कबीर के इस दोहे में शिक्षक को देवताओं के ऊपर बताया गया है| वर्तमान परिवेश में शिक्षकों को अपना कर्तव्य समझना होगा नई पीढ़ी के भविष्य का निर्माण उन्ही के हाथों में है | अगर ऐसा ना हों पाया तो हमारे देश का भविष्य दिशाहीन हों जायेगा |
स्वेता गुप्ता "स्वेतांबरी"
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