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संदेश

सच जरुरी क्यों है?

  सच का अर्थ है, जो यथार्थ हो! सच से रूबरू होना जरूरी भी है | सच को जानने व समझने का इस धरती पर सभी को समान रूप से अधिकार भी दिया गया है | हमें सच जानने का हक है |  हो भी क्यों ना, सच्चाई मनुष्य के हर उस पक्ष को हमारे सामने प्रस्तुत करती है, जिससे हम  अनभिज्ञ रहते हैं |  परंतु उस सच का क्या जिसे जानने के बाद रोष पैदा हो, रोष भी ऐसा वैसा नहीं, ज्वलनशील पदार्थ की तरह हवाओं में इस प्रकार से घुल जाए जो आग पैदा करें आग | हमें किस प्रकार का सच बताया जा रहा है, या जताया जा रहा है यह उस बात पर निर्भर करता है कि, आखिर वह सच क्या है?कैसा है?  वर्तमान परिपेक्ष्य में देखा जाए तो हम सच दिखाने और बताने के लिए इतने आतुर हो चुके हैं कि,सच की परिभाषा को तोड़ मरोड़ कर अपने फायदे के लिए नमक मिर्च के मसाले के साथ परोस रहे हैं| किसलिए परोस रहे हैं हमें नहीं पता| बस ज्वलंत मुद्दा है, उठाना है,उसे समाज के सामने पहुंचना है, चिंगारी को आग में बदलना है,और खड़े होकर तमाशा देखना है| तमाशा का लुत्फ़ उठाना है| समाज का वह तबका जिसे हम बुद्धिजीवी कहते हैं उनकी चुप्पी बड़ा विचलित करती है|  ...

हिन्दी अभेद दीवार

 "हिंदी देश के सबसे बड़े भूभाग में बोली जाने वाली भाषा है और राष्ट्रभाषा कहलाने की अधिकारिणी है"  यह कथन नोबेल पुरस्कार विजेता आदरणीय श्री रविंद्र नाथ टैगोर जी का है| बंगाल की भूमी में जन्मे और अपने कला क्षेत्र के लिए पूरे विश्व में प्रसिद्धि पाने वाले बंगाल के साहित्य शिरोमणि, हिंदी को प्रमुखता देते थे| कितने आश्चर्य की बात है कि उन्हीं की जन्मभूमि में हिन्दी के साथ भेदभाव हो रहा है|  जब यह समाचार सामने में आया कि बंगाल सिविल सर्विस परीक्षा में हिंदी को हटाया जा चुका है, तो दोबारा आँख मलते हुए समाचार को पढ़ा मैंने | अविश्वसनीय सा लगता है |ऐसा कैसे हो सकता है? जिस धरती पर हिंदी की अनेक संस्थाएँ जो अब तक हिंदी की सेवा में संलग्न है और उतनी ही तत्परता से हिंदी की सेवा करती आ रही है | उसी बंगाल की धरती पर हिन्दी के प्रति ऐसा भेदभाव |  विविधता में एकता का देश है हमारा, यहां क्षेत्रीय भाषा को उतना ही सम्मान मिलता है जितना कि राष्ट्रीय भाषा को मिलता है | गैर बंगालियों और हिंदी भाषियों ने बंगाल की उन्नति और विकास में उतना ही सहयोग दिया है जितना बंगाल वासी देते है...

सिकंदर हूँ मैं

 उम्र के इस मोड़ पर बिना पत्तों का दरख़्त हूँ तुम पतझड़ी मौसम सी सूखा समंदर हूं मैं  संगिनी तुम अर्धांगिनी मीठास बेस्वाद सा हूँ  तुम लहरों की सानी  जज्बातों का समंदर हूं मैं  तुम खिलती धूप सी  मैं बरगद की छांव  समय के अलबेले थपेड़ों में  अपनेपन का बवंडर हूं मैं  कौन कहता है उम्र बीत गई हाथों में तेरा हाथ हो तो तनती हर एक सांस तक  मुकद्दर का सिकंदर हूं मैं! मुकद्दर का सिकंदर हूं मैं!! @स्वेता गुप्ता "स्वेताम्बरी"

लहर

 *लहर*  अब लहर का नाम सुनते ही ना जाने क्यों भयावह एक कुंठा ह्रदय में बैठ जाती है | एक अंजाना सा सुप्त भय अचानक से जागने लगता है | 22 फरवरी 1920 देश में राष्ट्र के नाम संदेश सुना ; एक अप्रत्याशित अंजाना सा *लॉकडाउन* लगा दिया गया | जिससे हम अनभिज्ञ थे | शिक्षित थोड़ा समझ भी रहे थे, परन्तु जो रोजी-रोटी ही शिक्षा मान रहे थे उनके लिए तो विपदाओं का बहुत ही ऊंचा पहाड़ उन पर गिर पड़ा था |  चारों और भय का वातावरण, उस वातावरण में घुट घुट कर जीती जिंदगी! ऐसी जिंदगी जो समय सीमा में बंध गई थी| *मास्क* नाम का आवरण चेहरे पर चढ़ा दिया गया था | लगता था जैसे हम उधार का जीवन जी रहे हैं | लोग मर रहे थे, और अफवाहों का बाजार यूँ सज रहा था *सुबह उन्हें स्वस्थ देखा पर शाम को वह गुजर गए*  *ये करोना वरोंना कोई बीमारी नहीं सोची समझी साजिश है* *फंला वर्ग के लोगों ने हमारे वर्ग को मिटाने के लिए षड्यंत्र रचा है*|  पूरा विश्व इस त्रासदी से जूझ रहा था | एशिया के किन्हीं देशों में हजारों में लोग प्रतिदिन मर रहे थे | कोई दवा काम नहीं कर रही थी | केवल अनुमान व अनुभव से इलाज किया जा रहा था|  ल...

प्रेम----- गीत

रोज करते याद अब हम आपको, पीर कैसे हम  बताएं आपको....! दिल में मेरे बसाया था जहां, धड़कने उठती वहाँ बनके शमा! जो रहे अरमा जताना आपको, टूटकर चाहा बताना आपको! रोज करते याद अब हम आपको, पीर कैसे हम बताएं आपको....! प्रेम तुमसे है जताया ना कभी, दिल्लगी तुमको बताया ना सभी! प्रेम सच में जीत था ना हार भी, अब कहीं जाना सनम हम आपको! रोज करते याद अब हम आपको, पीर कैसे हम बताएं आपको.....! स्वेता गुप्ता "स्वेतांबरी"(कोलकाता) स्वरचित /मौलिक

वरदान

जीवन में वरदान मांगते, जीव अनेको देखें है | थोड़े में संतोष से जीते, सौ में एक ही देखे हैं || मिथ्या आडंबर दिखावा, सारा जीवन वार दिया | भंडार संपदा से ललचाकर, अपनों पर ही वार किया|| विकट समय मार्ग बदल जो, पीठ सदा दिखाते हैं | ऐसे रिश्ते निजता का, हमे  पाठ पढ़ा जाते है || स्वेता गुप्ता "स्वेताबरी"(कोलकाता) स्वरचित /मौलिक

चोट दिल पर

                      चोट दिल पर हमी रोज खाते रहे,                         सादगी से मगर मुस्कराते रहे|                         ज़ख्म गहरे मगर तो जताया नहीं,                         अश्क आंखो के हम वो छुपाते रहें|                           गम नहीं हो गये आप बेदर्द जो,                            चोट देकर जहर भी लगाते रहे|                           ख़्वाब जज्बात के नित बिखरते गये,                             अश्क मोती वहीं के सजाते रहे|                 ...