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आज का कवि साहित्यकार इतना अधीर क्यूँ????

 एक साहित्यकार समाज में हो रहे राजनैतिक, सामाजिक परिस्थितियों को, अपने मनोभावों को रचनाओं के माध्यम से  सजा कर प्रस्तुत करता है | समाज में घटित घटनाओ पर चिंतन मनन कर अपने  विचारों को अपनी लेखनी द्वारा प्रस्तुत करता है| 

पर आज के वर्तमान समय में कितने साहित्यकार और कवि है जिनमे एक होड़ सी लगी है |आगे बढ़नेके क्रम में उन्हें कविता की गुणवत्ता से कम मान पत्रों पर ज्यादा विशेष ध्यान रहने लगा है| या यूं कहें कि साहित्य क्षेत्र का पायदान धरातल की तरफ जाता जा रहा है |

अभी करोना के समय में जिस प्रकार से साहित्य को एक मीडिया प्लेटफॉर्म मिला है, यह एक सकारात्मक पक्ष कह सकते हैं| जिसमें बहुत से लोग जो इन क्षेत्रों से जुड़े हो कर भी कलमकारी से दूर थे |अब इस मीडिया प्लेटफॉर्म के द्वारा उन्हें साहित्य से जुड़ने का अवसर मिला है |अपनी लेखनी अपनी रचनाओं को पटल पर विश्व के समक्ष प्रस्तुत करने का अवसर  मिला है | परंतु नकारात्मक पक्ष भी है कि मीडिया प्लेटफॉर्म में किस प्रकार से एक ही विषय पर एक ही रचनाकार दो तीन रचनाएं लिखते हैं, और उसी विषय पर और भी कई रचनाकार अपनी रचनाएं प्रस्तुत करते हैं | जो उस विषय को तो भ्रमित करता ही है साथ ही रचना की गुणवत्ता पर भी असर पड़ता है| 

 उसपर अपने पटल का ज्यादा से ज्यादा प्रचार प्रसार हो रचना मानक को परखे बिना साहित्यिक परख और उसकी गुणवत्ता को देखे बिना मानपत्र प्रदान कर दिया जाता है |इससे क्या होता है? कि मानपत्र पाने की होड़ सी लग जाती है |यहां तक कि विषय पेटिका में जितने भी रचनाएं आती हैं उन रचनाओं को पढ़े बिना ही उन्हें मानपत्र दिया जाता है | क्यूँ?  क्यूंकि विषय पेटिका 1k से अधिक ना हुई तो पटल का नाम कैसे होगा !

 इससे हमारे साहित्य की गुणवत्ता, अभिव्यक्ति, राजनीतिक, समाजिक सोच को कमतर करता जा रहा है | यही कारण है कि रचनाकार बहुत ज्यादा अधीर होते जा रहे हैं| रचना की रचनाओं की गुणवत्ता और भी ज्यादा कम होती जा रही है जो अच्छे रचनाकार है वह भी इन सब के कारण पीछे होते जा रहे हैं |उनकी रचना को पढ़ना समझने का मौका भी नहीं मिल रहा है| यह कहना सार्थक होगा कि वर्तमान समय में कवि समाज  प्रतियोगिता अशक्त हो चुका है| वह मानपत्र के माया जाल में फंस चुका है |

अगर हमें इस अंधे कुएं से निकलना है, तो हमें अपने लिखने की गुणवत्ता पर ध्यान देना होगा| हाल ही में घटित एक उदाहरण प्रस्तुत करना चाहूंगी | एक अच्छे पटल संचालक महानुभाव से मेरी मुलाकात हुई | किसी कारणवश मैंने उनसे पूछा कि क्या आप सारी कविताओं को पढ़ते हैं? सारी कविताओं की गुणवत्ता पर आपका ध्यान होता है? तो उन्होंने कहा कि मेरे पास इतना समय नहीं है मैं केवल 50% ही कविताओं को पढ़ सकता हूं |यह सुनकर मुझे आश्चर्य हुआ कि, बिना रचनाओं को पढ़े आप उसके गुणवत्ता को जाने परखे, यहां तक की रचनाकार को साहित्य की समझ है भी या नहीं, आप मान पत्र कैसे दे सकते हैं| यही कारण है कि इस मानपत्र देने की प्रक्रिया के होड़ में साहित्य प्रेमी और कविताकार दोनों ही अधीर होते जा रहे हैं|

 यह साहित्य और साहित्यकार के लिये गंभीर चर्चा का विषय है | हमें इस विषय की गंभीरता पर विचार करना चाहिए |

स्वेता गुप्ता "स्वेतांबरी"(कोलकाता)

स्वरचित /मौलिक 

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